Summary
Chapter 2 of the Class 12 Hindi NCERT textbook (Antra), 'Saroj Smriti' (सरोज स्मृति), सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (1898-1961) द्वारा अपनी दिवंगत पुत्री सरोज की स्मृति में रचित शोक-कविता है, जिसमें पिता का विलाप, जीवन-संघर्ष और बेटी के प्रति अपार प्रेम व्यक्त हुआ है।
- पुत्री-वियोग का पितृ-विलाप — यह शोक-कविता निराला के जीवन में माँ, पत्नी और अंततः पुत्री सरोज की मृत्यु से उपजे गहन दुख को व्यक्त करती है; 'दुख ही जीवन की कथा रही' पंक्ति पिता की असीम पीड़ा को मुखर करती है।
- भाग्यहीन पिता का संघर्ष — कविता केवल विलाप नहीं, भाग्यहीन पिता के जीवन-संघर्ष, समाज से उसके संबंधों और पुत्री के लिए बहुत कुछ न कर पाने के अकर्मण्यता-बोध की भी अभिव्यक्ति है।
- सूना विवाह और स्वयं-निभाई भूमिकाएँ — विवाह में 'आत्मीय स्वजन कोई थे नहीं, न आमंत्रण था भेजा गया'; पिता ने स्वयं माँ की कुल-शिक्षा दी और पुष्प-सेज रची — सरोज नानी की गोद और मामा-मामी के स्नेह में पली और वहीं शरण लेकर विदा हुई।
- स्वर्गीया पत्नी की छवि और तर्पण — कवि को बेटी के रूप-रंग में दिवंगत पत्नी दिखती है; अंत में वह 'कन्ये, गत कर्मों का अर्पण कर, करता मैं तेरा तर्पण!' कहकर पुत्री का तर्पण करता है, यही कविता का करुण चरम है।
Key points & formulas
- 01कवि परिचय: सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (1898-1961) का जन्म बंगाल में मेदिनीपुर जिले के महिषादल गाँव में हुआ; पितृग्राम गढ़कोला (उन्नाव), उत्तर प्रदेश है। बचपन में माँ का निधन हुआ, सन् 1918 में पत्नी का देहांत हुआ, और अंत में पुत्री सरोज की मृत्यु ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया।
- 02विधा: शोक-कविता; निराला मुक्त छंद के प्रवर्तक माने जाते हैं।
- 03केंद्रीय भाव: पुत्री की मृत्यु पर पिता का विलाप, साथ ही 'भाग्यहीन पिता का संघर्ष, समाज से उसके संबंध, पुत्री के प्रति बहुत कुछ न कर पाने का अकर्मण्यता बोध' — जैसा स्रोत-पाठ में वर्णित है।
- 04मुख्य प्रसंग: विवाह में 'आत्मीय स्वजन कोई थे नहीं, न आमंत्रण था भेजा गया।' पिता ने माँ की कुल शिक्षा स्वयं दी और पुष्प-सेज स्वयं रची। सरोज नानी की स्नेह-गोद में और मामा-मामी के प्यार में पली; अंत भी 'उसी गोद में शरण' लेकर हुआ।
- 05स्वर्गीया पत्नी की याद: कवि को बेटी के रूप-रंग में पत्नी का रूप-रंग दिखाई पड़ता है। कविता में 'स्वर्गीया-प्रिया-संग' गाया गया शृंगार रति-रूप पाकर 'आकाश बदल कर बना मही।' कवि ने शकुंतला की भी याद की — 'पर पाठ अन्य यह, अन्य कला।'
- 06शब्दार्थ: संबल = सहारा; तर्पण = देवताओं, ऋषियों और पितरों को तिल या तंडुलमिश्रित जल देने की क्रिया; रति-रूप = कामदेव की पत्नी के रूप जैसी, अत्यंत सुंदर; वज्रपात = भारी विपत्ति, कठोर; मही = पृथ्वी।
- 07केंद्रीय पंक्तियाँ: 'दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज जो नहीं कही!' — पिता की असीम पीड़ा की अभिव्यक्ति। अंत में कवि कहता है — 'कन्ये, गत कर्मों का अर्पण / कर, करता मैं तेरा तर्पण!'
Frequently asked questions
01Saroj Smriti kisne likhi hai?
सरोज स्मृति सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने लिखी है। यह उनकी दिवंगत पुत्री सरोज की स्मृति में रचित कविता है।
02सरोज स्मृति कविता का मुख्य विषय क्या है?
सरोज स्मृति निराला की दिवंगत पुत्री सरोज पर केंद्रित है। यह बेटी के दिवंगत होने पर पिता का विलाप है, जिसमें भाग्यहीन पिता का संघर्ष, समाज से उसके संबंध और पुत्री के प्रति बहुत कुछ न कर पाने का अकर्मण्यता बोध भी प्रकट हुआ है।
03सरोज का विवाह अन्य विवाहों से किस प्रकार भिन्न था?
सरोज के विवाह में कोई आत्मीय स्वजन नहीं थे और न ही कोई आमंत्रण भेजा गया था — 'आत्मीय स्वजन, कोई थे नहीं, न आमंत्रण / था भेजा गया।' पिता ने माँ की कुल शिक्षा स्वयं दी और पुष्प-सेज भी स्वयं रची।
04'दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज जो नहीं कही' — इस पंक्ति का आशय क्या है?
यह पंक्ति निराला की असीम पीड़ा और मौन व्यथा को व्यक्त करती है। माँ, पत्नी, पिता, चाचा और अंत में पुत्री सरोज की मृत्यु देखने के बाद कवि कहता है कि उसका पूरा जीवन दुख की कहानी रहा — और यह दुख इतना गहरा है कि अब तक कहा नहीं जा सका।
05Nirala ko apni swargiya patni ki yaad kyon aayi?
निराला को पुत्री सरोज के रूप-रंग में अपनी स्वर्गीया पत्नी का रूप-रंग दिखाई पड़ा। कविता में 'स्वर्गीया-प्रिया-संग' गाए गए शृंगार का रति-रूप पाकर 'आकाश बदल कर बना मही' — जो प्रेम-स्मृति आकाश में थी वह पुत्री के रूप में पृथ्वी पर उतर आई।
06'आकाश बदल कर बना मही' में आकाश और मही किनकी ओर संकेत करते हैं?
कविता की पंक्तियों और पाठ-परिचय के संदर्भ में — 'स्वर्गीया-प्रिया' (मृत पत्नी की स्मृति) आकाश की ओर संकेत करती है और पुत्री सरोज का पृथ्वी-रूप मही की ओर। पत्नी का प्रेम और रूप आकाश से बदलकर पुत्री के रूप में मही (पृथ्वी) पर प्रकट हुआ।
07सरोज ने अंत में कहाँ शरण ली?
कविता में कहा गया — 'अंत भी उसी गोद में शरण / ली, मूँदे दृग वर महामरण!' — सरोज ने अंत में नानी की उसी स्नेह-गोद में शरण ली जहाँ वह कली की तरह खिली और पली थी।
08निराला ने सरोज के विवाह में कौन-सी जिम्मेदारियाँ स्वयं निभाईं?
कवि ने कहा — 'माँ की कुल शिक्षा मैंने दी, / पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची।' अर्थात् जो शिक्षा और संस्कार एक माँ देती है वह सब पिता ने स्वयं दिए और विवाह में पुष्प-शय्या भी स्वयं सजाई।
09'वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली' — इस पंक्ति में किस प्रसंग का संकेत है?
इस पंक्ति में यह प्रसंग है कि सरोज जहाँ — नानी की स्नेह-गोद में — 'कली' की तरह खिली, स्नेह से हिली-पली, वहीं की 'लता' वह थी; और जीवन का अंत भी उसी गोद में हुआ। विवाह के बाद भी 'बैठी नानी की स्नेह-गोद' में रही।
10Saroj Smriti mein Shakuntala ka ullekh kyon hai?
पिता ने पुष्प-सेज रचते हुए मन में सोचा — 'वह शकुंतला' (कालिदास की नाट्यकृति की नायिका)। किंतु स्वयं स्वीकार किया — 'पर पाठ अन्य यह, अन्य कला' — अर्थात् यह स्थिति और कला शकुंतला की परिस्थिति से भिन्न है।
11निराला की प्रमुख काव्य कृतियाँ कौन-सी हैं?
स्रोत-पाठ के अनुसार निराला की प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं — परिमल, गीतिका, अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, नए पत्ते, बेला, अर्चना, आराधना, गीतगुंज आदि। उनका संपूर्ण साहित्य निराला रचनावली के आठ खंडों में प्रकाशित हो चुका है।
12क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?
हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।
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