Class 12 Hindi

Chapter 17 — Kutaj

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Overview

Summary

Chapter 17 of the Class 12 Hindi NCERT textbook (Antra), 'Kutaj' (कुटज), हजारी प्रसाद द्विवेदी का प्रसिद्ध निबंध है, जिसमें हिमालय की सूखी चट्टानों पर उगने वाले कुटज पौधे की अपराजेय जीवनशक्ति के माध्यम से मनुष्य को स्वावलंबन और शान से जीने का संदेश दिया गया है।

  • कुटज — अपराजेय जीवनशक्ति का प्रतीकशिवालिक की सूखी शिलाओं पर बिना सौंदर्य-सुगंध के भी कुटज पाषाण की छाती फाड़कर, भूख-प्यास सहकर हँसता-मुस्कुराता जीता है — उसमें स्वावलंबन, आत्मविश्वास और विषम परिस्थिति में जीने की क्षमता है।
  • नाम-रूप का दार्शनिक विमर्शलेखक 'रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य' से आरंभ कर स्वार्थ, जिजीविषा और परमार्थ का विश्लेषण करते हैं; याज्ञवल्क्य के 'आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति' को लेकर समष्टि-बुद्धि की चर्चा करते हैं।
  • साहित्यिक संदर्भों की बुनावटकालिदास ने मेघदूत में कुटज-पुष्पों से मेघ की अभ्यर्थना कराई — इसीलिए लेखक कुटज को 'गाढ़े का साथी' कहते हैं; रहीम द्वारा उसे साधारण झाड़ी कहना लेखक को गलत-बयानी लगता है।
  • 'हृदयेनापराजितः' का जीवन-आदर्शपाताल का जल पीकर, झंझा से रगड़कर उल्लास खींच आकाश को चूमता कुटज सिखाता है कि सुख-दुख को समभाव से स्वीकारते हुए 'हृदयेनापराजितः' होकर शान से जीना ही सच्चा जीवन है।
Essentials

Key points & formulas

  1. 01लेखक परिचय: हजारी प्रसाद द्विवेदी (सन् 1907–1979), जन्म ग्राम आरत दुबे का छपरा, जिला बलिया (उ.प्र.); 1940–50 तक शांति निकेतन में हिंदी भवन के निदेशक; 'आलोक पर्व' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार; भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्मानित।
  2. 02विधा: निबंध — व्यक्तित्व-व्यंजकता और आत्मपरकता लेखक की शैली की विशेषता है; व्यंग्य शैली के प्रयोग ने पांडित्य के बोझ को हावी नहीं होने दिया।
  3. 03केंद्रीय भाव: कुटज हिमालय की ऊँचाई पर सूखी शिलाओं के बीच उगने वाला जंगली पौधा है; उसमें 'अपराजेय जीवनशक्ति है, स्वावलंबन है, आत्मविश्वास है और विषम परिस्थितियों में भी शान के साथ जीने की क्षमता है।'
  4. 04दार्शनिक विमर्श: 'रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य' — लेखक नाम और रूप के प्रश्न से आरंभ करके स्वार्थ, जिजीविषा और परमार्थ का विश्लेषण करते हैं; याज्ञवल्क्य के 'आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति' को लेकर समष्टि-बुद्धि की चर्चा करते हैं।
  5. 05साहित्यिक संदर्भ: कालिदास ने मेघदूत में रामगिरि पर यक्ष से कुटज पुष्पों की अंजलि देकर मेघ की अभ्यर्थना कराई — इसीलिए लेखक ने कुटज को 'गाढ़े के साथी' कहा; रहीम ने कुटज को साधारण झाड़ी कहा जिसे लेखक ने गलत-बयानी माना।
  6. 06कुटज का उपदेश (स्रोत से संस्कृत श्लोक): 'भित्त्वा पाषाणपिठरं छित्त्वा प्राभञ्जनी व्यथाम् / पीत्वा पातालपानीयं कुटज श्युम्बते नभः' — पाताल का जल पीकर, झंझा-तूफान से रगड़कर उल्लास खींचकर आकाश को चूमना; और शांतिपर्व का आदर्श: 'हृदयेनापराजितः!'
  7. 07कठिन शब्दार्थ (स्रोत की शब्दार्थ सूची से): द्वंद्वातीत — द्वंद्व से परे; अकुतोभय — जिसे कहीं या किसी से भय न हो, नितांत भयशून्य; दुरंत — जिसका पार पाना कठिन हो, प्रबल; कार्पण्य — कृपणता, कंजूसी; अंतर्निरुद्ध — भीतरी रुकावट।
Questions

Frequently asked questions

01

कुटज निबंध के लेखक कौन हैं?

कुटज निबंध के लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं, जिनका जन्म सन् 1907 में ग्राम आरत दुबे का छपरा, जिला बलिया (उत्तर प्रदेश) में हुआ था और निधन 1979 में हुआ।

02

Kutaj nibandh kis vishay par hai aur iska kendra kya hai?

यह निबंध हिमालय की सूखी शिलाओं पर उगने वाले कुटज पौधे पर है। इसका केंद्र इस पौधे की अपराजेय जीवनशक्ति, स्वावलंबन और आत्मविश्वास है जो मनुष्य के लिए संदेश बन जाता है।

03

कुटज पौधा कहाँ उगता है और उसकी क्या विशेषता है?

कुटज हिमालय पर्वत की ऊँचाई पर सूखी शिलाओं के बीच उगने वाला जंगली पौधा है। उसमें न विशेष सौंदर्य है, न सुगंध — फिर भी वह पाषाण की छाती फाड़कर रस खींचकर फूलों से लदा रहता है।

04

कुटज को 'गाढ़े के साथी' क्यों कहा गया है?

कालिदास ने मेघदूत में 'आषाढ़स्य प्रथम-दिवसे' रामगिरि पर यक्ष को मेघ की अभ्यर्थना के लिए कुटज पुष्पों की अंजलि देने पर विवश होना पड़ा — उस समय और कोई फूल नहीं मिला। इसलिए लेखक ने कुटज को 'गाढ़े के साथी' कहा।

05

'रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य' — इस कथन का क्या अर्थ है?

लेखक के अनुसार रूप व्यक्ति की अपनी पहचान है जबकि नाम वह पद है जिस पर समाज की मुहर लगी होती है — आधुनिक शब्दों में 'सोशल सेंक्शन'। नाम की सार्थकता समाज की स्वीकृति, इतिहास के प्रमाण और समष्टि-मानव की चेतना में है।

06

कालिदास का कुटज से क्या संबंध है?

कालिदास ने मेघदूत में रामगिरि पर यक्ष से ताजे कुटज पुष्पों की अंजलि देकर मेघ की अभ्यर्थना कराई। चंपक, बकुल, नीलोत्पल, मल्लिका — कोई और फूल नहीं मिला; फकत कुटज के फूल से काम चला।

07

रहीम ने कुटज के बारे में क्या कहा और लेखक का मत क्या है?

रहीम ने लिखा — 'वे रहीम अब बिरछ कहँ, जिनकर छॉह गंभीर / बागन बिच-बिच देखियत, सेंहुड़ कुटज करीर।' लेखक ने इसे कवि की 'गलत-बयानी' माना क्योंकि झुँझलाहट में रहीम ने बाग से गिरिकूट-बिहारी कुटज की तुलना कर दी जो उचित नहीं था।

08

'हृदयेनापराजितः' का क्या भाव है?

यह शांतिपर्व (26/1/26) के श्लोक से है — 'सुखं वा यदि वा दुःखं प्रियं वा यदि वा अप्रियम् / प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः॥' — अर्थात जो भी मिले, सुख हो या दुख, प्रिय हो या अप्रिय, उसे हृदय से अपराजित होकर स्वीकार करो।

09

कुटज किन मानवीय कमजोरियों पर व्यंग्य करता है?

लेखक के अनुसार कुटज 'दूसरे के द्वार पर भीख नहीं माँगता, अफसरों का जूता नहीं चाटता, ग्रहों की खुशामद नहीं करता, दाँत नहीं निपोरता, बगलें नहीं झाँकता।' कुटज इन सब मिथ्याचारों से मुक्त है और शान से जीता है।

10

'दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं' — लेखक का क्या तात्पर्य है?

लेखक कहते हैं — 'सुखी वह है जिसका मन वश में है, दुखी वह है जिसका मन परवश है।' परवश होने का अर्थ है खुशामद, चाटुकारिता, हाँ-हजूरी। कुटज वशी है — वह मन पर सवार होता है, मन को अपने पर नहीं होने देता।

11

Hazari Prasad Dwivedi ne Kutaj mein kaun se Sanskrit shlokon ka upyog kiya hai?

निबंध में दो प्रमुख संस्कृत श्लोक हैं: (1) कुटज की जीवनशक्ति पर — 'भित्त्वा पाषाणपिठरं छित्त्वा प्राभञ्जनी व्यथाम् / पीत्वा पातालपानीयं कुटज श्युम्बते नभः'; (2) शांतिपर्व से — 'प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः॥'।

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