Summary
Chapter 9 of the Class 12 Hindi NCERT textbook (Antra), 'Kavitt' (कवित्त), रीतिकाल की रीतिमुक्त/स्वच्छंद काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि घनानंद (सन् 1673-1760) के दो कवित्त प्रस्तुत करता है, जिनमें प्रेमिका सुजान के दर्शन की अभिलाषा और प्रेम-वियोग की गहरी पीड़ा व्यक्त है।
- घनानंद और सुजान का जीवन-प्रसंग — बादशाह मुहम्मद शाह के मीर मुंशी घनानंद का सुजान से अटूट प्रेम था; उसकी बेवफ़ाई और दरबार से निष्कासन के बाद वे वृंदावन जाकर निबार्क संप्रदाय में दीक्षित हुए, और सुजान का नाम काव्य में प्रतीक बन गया।
- प्रेम की पीड़ा और वियोग के कवि — 'घनानंद मूलतः प्रेम की पीड़ा के कवि हैं' — पहले कवित्त में प्राण सुजान को संदेश लेकर जाना चाहते हैं, दूसरे में प्रेमिका की आनाकानी और मौन पर व्यंग्यपूर्ण प्रश्न उठते हैं।
- रसमूर्ति की काव्य-कला — साक्षात रसमूर्ति कहे गए घनानंद की भाषा परिष्कृत ब्रजभाषा है जिसमें लाक्षणिकता, वक्रोक्ति, वाग्विदग्धता और अनुप्रास का कुशल प्रयोग है — सहजता के साथ वचन-वक्रता का अद्भुत मेल उनकी विशेषता है।
Key points & formulas
- 01कवि परिचय: घनानंद (सन् 1673-1760) — रीतिकाल की रीतिमुक्त/स्वच्छंद काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि; दिल्ली के बादशाह मुहम्मद शाह के मीर मुंशी; वृंदावन में निबार्क संप्रदाय में दीक्षित
- 02विधा: कवित्त — ब्रजभाषा में लिखे दो कवित्त; घनानंद को साक्षात रसमूर्ति कहा गया है
- 03जीवन-प्रसंग: सुजान से अटूट प्रेम; उनकी बेवफ़ाई और बादशाह द्वारा दरबार से निष्कासन; वृंदावन में भक्त के रूप में जीवन-निर्वाह; सुजान के नाम का प्रतीकात्मक प्रयोग काव्य में
- 04केंद्रीय भाव: प्रेम की पीड़ा और वियोग — 'घनानंद मूलतः प्रेम की पीड़ा के कवि हैं'; पहले कवित्त में प्राण सुजान को संदेश लेकर जाना चाहते हैं; दूसरे में प्रेमिका की आनाकानी और मौन पर प्रश्न
- 05प्रमुख रचनाएँ: सुजान सागर, विरह लीला, कृपाकंड निबंध, रसकेलि वल्ली
- 06काव्य-विशेषताएँ: लाक्षणिकता, वक्रोक्ति, वाग्विदग्धता और अलंकारों का कुशल प्रयोग; सहजता के साथ वचन-वक्रता का अद्भुत मेल; अनुप्रास अलंकार का प्रयोग
- 07कठिन शब्दार्थ: 'पत्यानि' = विश्वास करना; 'आनाकानी' = टालने की बात; 'आरसी' = स्त्रियों द्वारा अँगूठे में पहना जाने वाला शीशा जड़ा आभूषण; 'कूकभरी' = पुकार भरी; 'पैज' = बहस; 'बहरायबे' = बहरे बनने की, कानों से न सुनने की
Frequently asked questions
01घनानंद कौन थे और उनका जीवन-परिचय क्या है?
घनानंद (सन् 1673-1760) रीतिकाल की रीतिमुक्त/स्वच्छंद काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि थे। वे दिल्ली के बादशाह मुहम्मद शाह के मीर मुंशी थे। सुजान से प्रेम और बादशाह के दरबार से निष्कासन के बाद वे वृंदावन चले गए और निबार्क संप्रदाय में दीक्षित हो गए।
02Ghanananand ki pramukh rachnayein kaun si hain?
घनानंद की प्रमुख रचनाएँ हैं — सुजान सागर, विरह लीला, कृपाकंड निबंध और रसकेलि वल्ली।
03'चाहत चलन ये संदेसो लै सुजान को' — कवि ने ऐसा क्यों कहा है?
पाठ के अनुसार कवि के प्राण 'सुजान के दर्शन के लिए ही अब तक अटके हुए हैं।' इस पंक्ति में कवि ने कहा है कि उनके प्राण झूठी बातों पर विश्वास करते-करते उदास हो चुके हैं और अब वे सुजान का संदेश लेकर उसके पास जाना चाहते हैं।
04कवि मौन होकर प्रेमिका के कौन से प्रण पालन को देखना चाहता है?
कवि यह देखना चाहता है कि प्रेमिका आनाकानी करते हुए अपना मौन कब तक बनाए रख सकती है। उसे विश्वास है कि 'कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै' — उसकी पुकार भरी चुप्पी उसे स्वयं ही बोलने पर विवश कर देगी।
05Ghanananand ko 'saksat rasmurti' kyon kaha gaya hai?
स्रोत के अनुसार, 'उनकी रचनाओं में प्रेम का अत्यंत गंभीर, निर्मल, आवेगमय, और व्याकुल कर देने वाला उदात्त रूप व्यक्त हुआ है' — इसीलिए घनानंद को साक्षात रसमूर्ति कहा गया है।
06घनानंद की भाषिक विशेषताएँ क्या हैं?
घनानंद की भाषा परिष्कृत और साहित्यिक ब्रजभाषा है। उसमें कोमलता और मधुरता का चरम विकास दिखाई देता है। उनकी काव्य-कला में सहजता के साथ वचन-वक्रता का अद्भुत मेल है। वे ब्रजभाषा के प्रवीण ही नहीं, सर्जनात्मक काव्यभाषा के प्रणेता भी थे।
07'आरसी' और 'आनाकानी' का अर्थ क्या है?
पाठ के शब्दार्थ के अनुसार — 'आरसी' = स्त्रियों द्वारा अँगूठे में पहना जाने वाला शीशा जड़ा आभूषण; 'आनाकानी' = टालने की बात।
08Ghanananand ka Sujaan se kya sambandh tha?
घनानंद का सुजान नाम की एक स्त्री से अटूट प्रेम था। सुजान की बेवफ़ाई से वे निराश और दुखी हुए, किंतु उसे भूल नहीं सके और अपनी रचनाओं में सुजान के नाम का प्रतीकात्मक प्रयोग करते हुए काव्य-रचना करते रहे।
09घनानंद किस काल और काव्यधारा के कवि हैं?
घनानंद रीतिकाल के रीतिमुक्त या स्वच्छंद काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि हैं। उनकी रचनाओं में प्रेम का गंभीर और व्याकुल उदात्त रूप मिलता है।
10दूसरे कवित्त में 'रुई दिए रहौगे कहाँ लौ बहरायबे की' का क्या आशय है?
पाठ के अनुसार 'बहरायबे' का अर्थ है — बहरे बनने की, कानों से न सुनने की। इस पंक्ति में कवि प्रेमिका से पूछता है कि वह कानों में रुई डालकर (कानों से न सुनकर) कब तक उसकी पुकार को अनसुना करती रहेगी।
11Antra Class 12 Chapter 9 Ghanananand kavitt mein kaun sa pramukh alankar hai?
पाठ की योग्यता-विस्तार में 'पठित अंश में से अनुप्रास अलंकार की पहचान कर एक सूची तैयार कीजिए' कहा गया है, जो यह स्पष्ट करता है कि अनुप्रास अलंकार इन कवित्तों में प्रमुखता से है।
12क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?
हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।
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