Class 6 Sanskrit

Chapter 14 — Aalasyam Hi Manushyanam Shareerasthah Mahan Ripuh

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Overview

Summary

Chapter 14 of the Class 6 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Aalasyam Hi Manushyanam Shareerasthah Mahan Ripuh' (आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः), इस पाठ में एक स्वस्थ भिक्षुक की कथा के माध्यम से सिखाया गया है कि आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है और परिश्रम ही सच्चा मित्र।

  • भिक्षुक एवं धनिक का संवादएक स्वस्थ, दृढकाय युवा भिक्षुक होते हुए भी भिक्षाटन करता था। एक धनिक ने उसके पादों के लिए सहस्र और हस्तों के लिए पञ्चसहस्र रूप्यकाणि देने का प्रस्ताव रखा, किंतु भिक्षुक ने प्रत्येक बार अस्वीकार कर दिया।
  • उपदेश एवं परिवर्तनधनिक ने समझाया कि तुम्हारे पास ही हजारों से अधिक मूल्यवान वस्तुएँ हैं, फिर स्वयं को दुर्बल क्यों मानते हो। इससे प्रेरित होकर भिक्षुक ने भिक्षाटन त्यागकर परिश्रम से धनार्जन और सगौरव जीवनयापन आरंभ किया।
  • सुभाषित एवं व्याकरणमुख्य सुभाषित — 'आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः। नास्त्युद्यमसमो बन्धुः' — आलस्य महान शत्रु और परिश्रम सर्वश्रेष्ठ मित्र है। पाठ में द्वितीया विभक्ति (कर्मकारक) के रूप भी सिखाए गए हैं।
Essentials

Key points & formulas

  1. 01पाठ में एक स्वस्थ एवं दृढकाय युवा भिक्षुक की कथा है जो भिक्षाटन करता था — मार्ग में मिलने वाले सभी से धन या भिक्षा माँगता था।
  2. 02एक धनिक ने भिक्षुक के पादों के लिए सहस्र रूप्यकाणि और हस्तों के लिए पञ्चसहस्र रूप्यकाणि देने का प्रस्ताव रखा, किंतु भिक्षुक ने प्रत्येक बार निराकृत (अस्वीकार) किया।
  3. 03धनिक ने उपदेश दिया कि तुम्हारे पास ही हजारों से अधिक मूल्य की वस्तुएँ हैं; सौभाग्य से मिले मानव जन्म को सफल बनाने के लिए प्रयत्न करो।
  4. 04उस दिन से भिक्षुक ने भिक्षाटन त्यागकर परिश्रम से धनार्जन किया और सगौरवं जीवनयापन आरंभ किया।
  5. 05मुख्य सुभाषित: "आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः। नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति।।" — आलस्य मनुष्य के शरीर में स्थित महान शत्रु है; परिश्रम के समान कोई मित्र नहीं जिसे करने से कोई दुखी नहीं होता।
  6. 06व्याकरण-बिंदु: इस पाठ में द्वितीया विभक्ति (कर्मकारक) के एकवचन, द्विवचन और बहुवचन रूप पुंलिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग में सिखाए गए हैं।
  7. 07कठिन शब्द: दृढकायः = दृढ़ शरीर वाला; भिक्षाटनम् = भीख के लिए घूमना; निराकृतवान् = अस्वीकार किया; नावसीदति = दुखी नहीं होता।
Questions

Frequently asked questions

01

Aalasyam Hi Manushyanam Shareerasthah Mahan Ripuh paath me kya sikhaya gaya hai?

इस पाठ में सिखाया गया है कि आलस्य मनुष्य के शरीर में स्थित सबसे बड़ा शत्रु है। एक स्वस्थ भिक्षुक की कथा के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि परिश्रम ही सच्चा मित्र है और परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता। साथ में द्वितीया विभक्ति का व्याकरण भी सिखाया गया है।

02

Aalasyam Hi Manushyanam Shareerasthah Mahan Ripuh ka arth kya hai?

इसका अर्थ है — 'आलस्य मनुष्यों के शरीर में स्थित महान शत्रु है।' यह इस पाठ के मुख्य सुभाषित की पहली पंक्ति है। पूरा सुभाषित है: 'आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः। नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति।।' — परिश्रम के समान कोई मित्र नहीं, जिसे करने से कोई दुखी नहीं होता।

03

इस पाठ के भिक्षुक की क्या विशेषता थी?

पाठ के अनुसार भिक्षुक उन्नत एवं दृढकाय (मजबूत शरीर वाला) युवक था। वह शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ था, फिर भी भिक्षाटन (भीख माँगना) करता था और मार्ग में मिलने वाले सभी से धन माँगता था।

04

धनिक ने भिक्षुक के किन-किन अंगों को खरीदना चाहा?

धनिक ने पहले भिक्षुक के पादौ (पैरों) के लिए सहस्र (एक हजार) रूप्यकाणि और फिर हस्तौ (हाथों) के लिए पञ्चसहस्र (पाँच हजार) रूप्यकाणि देने का प्रस्ताव रखा। इसी प्रकार उसने भिक्षुक के अनेकानि शरीराङ्गानि (अनेक शरीर के अंग) खरीदने की इच्छा जताई, परंतु भिक्षुक ने हर बार निराकृतवान् (अस्वीकार किया)।

05

भिक्षुक ने अपने पैर और हाथ क्यों नहीं बेचे?

भिक्षुक ने पैर बेचने से इसलिए मना किया क्योंकि पैरों के बिना वह चल नहीं सकता था (विना पादौ कथं वा चलामि?)। हाथ बेचने से इसलिए मना किया क्योंकि हाथों के बिना वह भिक्षा नहीं ले सकता था (हस्ताभ्यां विना अहं कथं भिक्षां स्वीकरोमि?)।

06

धनिक ने भिक्षुक को क्या उपदेश दिया?

धनिक ने कहा — 'देखो मित्र! तुम्हारे पास ही हजारों से अधिक मूल्यवान वस्तुएँ हैं, फिर भी तुम स्वयं को दुर्बल क्यों मानते हो? सौभाग्य से हमें मानवजन्म मिला है — इसे सफल बनाने के लिए प्रयत्न करो।' यह उपदेश सुनकर भिक्षुक का जीवन बदल गया।

07

धनिक का उपदेश सुनकर भिक्षुक ने क्या किया?

उस दिन से भिक्षुक ने भिक्षाटन त्याग दिया और परिश्रम से धनार्जन करके सम्मानपूर्वक जीवन जीने लगा। पाठ में इसे इस प्रकार कहा गया है: 'भिक्षाटनं त्यक्त्वा परिश्रमेण धनार्जनं कृत्वा सगौरवं जीवनयापनम् आरब्धवान्।'

08

इस पाठ के मुख्य सुभाषित का भावार्थ क्या है?

पाठ में दिए भावार्थ के अनुसार: आलस्य मनुष्य के शरीर में स्थित महान शत्रु है क्योंकि आलस्य के कारण कार्य सिद्ध नहीं होता। इसी प्रकार परिश्रम के समान कोई मित्र नहीं है क्योंकि परिश्रम करने से कोई दुखी नहीं होता।

09

इस पाठ में कौन-सा व्याकरण-बिंदु सिखाया गया है?

इस पाठ में द्वितीया विभक्ति (कर्मकारक) सिखाई गई है। अकारान्त पुंलिंग (ग्राम, भिक्षुक, बालक), आकारान्त स्त्रीलिंग (भिक्षा, माला, बालिका), ईकारान्त स्त्रीलिंग (नदी, लेखनी, भगिनी), अकारान्त नपुंसकलिंग (फल, जल, गृह) और सर्वनामों (अस्मद्, युष्मद्, तद्, एतद्) के एकवचन, द्विवचन और बहुवचन रूप दिए गए हैं।

10

'निराकृतवान्' और 'नावसीदति' का क्या अर्थ है?

पाठ के शब्दार्थ खंड के अनुसार: 'निराकृतवान्' का अर्थ है — न स्वीकृतवान् अर्थात् अस्वीकार किया। 'नावसीदति' का अर्थ है — दुःखितः न भवति अर्थात् दुखी नहीं होता।

11

'दृढकायः' और 'भिक्षाटनम्' का अर्थ क्या है?

पाठ के शब्दार्थ खंड के अनुसार: 'दृढकायः' का अर्थ है — दृढशरीरः अर्थात् दृढ़/मजबूत शरीर वाला। 'भिक्षाटनम्' का अर्थ है — भिक्षार्थं भ्रमणम् अर्थात् भीख के लिए घूमना।

12

'प्रभूतम्' और 'त्यक्त्वा' का अर्थ क्या है?

पाठ के शब्दार्थ खंड के अनुसार: 'प्रभूतम्' का अर्थ है — पर्याप्तम्/अधिकम् अर्थात् ढेर सारा/बहुत। 'त्यक्त्वा' का अर्थ है — त्यागं कृत्वा अर्थात् त्याग करके।

13

इस पाठ की नैतिक शिक्षा (moral) क्या है?

इस पाठ की नैतिक शिक्षा यह है कि परिश्रम ही मनुष्य का सच्चा मित्र है और आलस्य सबसे बड़ा शत्रु। मनुष्य के पास शारीरिक क्षमता और अनमोल जीवन है — इसे परिश्रम से सार्थक बनाना चाहिए, आलस्य में नष्ट नहीं करना चाहिए।

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