Summary
Chapter 11 of the Class 8 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Sannimitte Varam Tyagah (Kha-Bhag)' (सन्निमित्ते वरं त्यागः — ख-भाग), राजरक्षक वीरवर और उसके परिवार के नि:स्वार्थ बलिदान की कथा का दूसरा भाग है। यह सिखाता है कि उचित कारण के लिए किया गया त्याग सर्वश्रेष्ठ होता है।
- सम्पूर्ण परिवार का बलिदान — राजा शूद्रक को बचाने हेतु वीरवर को सर्वप्रिय वस्तु देवी सर्वमंगला को अर्पित करनी है। पुत्र शक्तिधर, पत्नी वेदरता और पुत्री वीरवती सहर्ष सहमत होकर स्वयं को देवी के मन्दिर में अर्पित कर देते हैं।
- त्याग का आदर्श एवं कथा-परिणाम — मुख्य श्लोक 'सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति' दूसरों के लिए धन-जीवन त्यागने की प्रेरणा देता है। देवी सर्वमंगला परिवार को जीवित करती है और प्रसन्न राजा वीरवर को समग्र कर्णाटक प्रदेश पुरस्कार देता है।
- व्याकरण — वाच्य-भेद — पाठ वाच्य के तीन प्रकार सिखाता है — कर्तृवाच्य (कर्ता में प्रथमा), कर्मवाच्य (कर्ता में तृतीया, कर्म में प्रथमा; धातु + य + आत्मनेपद) और भाववाच्य (कर्म रहित, क्रिया अपरिवर्तनीय) — नियम एवं उदाहरण सहित।
Key points & formulas
- 01विषय/कथावस्तु: यह पाठ राजा शूद्रक के स्वामिभक्त राजपुरुष वीरवर और उसके पूरे परिवार की नि:स्वार्थ त्याग-कथा है जो संवाद-शैली में प्रस्तुत की गई है।
- 02केंद्रीय शिक्षा (मुख्य श्लोक): 'धनानि जीवितञ्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् / सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति' — बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों के लिए धन और जीवन त्याग सकता है, क्योंकि शरीर का नाश निश्चित है और उचित कारण के लिए किया गया त्याग श्रेष्ठ है।
- 03प्रमुख पात्र: वीरवर (राजा शूद्रक का स्वामिभक्त राजपुरुष), शक्तिधर (वीरवर का पुत्र), वेदरता (वीरवर की पत्नी), वीरवती (वीरवर की पुत्री), राजा शूद्रक, राजलक्ष्मी और देवी सर्वमंगला।
- 04कथा-परिणाम: देवी सर्वमंगला वीरवर के सत्त्वोत्कर्ष (सत्त्वगुण की पराकाष्ठा) और राजा के भृत्यवात्सल्य (सेवक के प्रति स्नेह) से प्रसन्न होकर परिवार को जीवन लौटाती है; राजा वीरवर को समग्र कर्णाटक प्रदेश पुरस्कार में देता है।
- 05व्याकरण-विषय: पाठ में वाच्य के तीन प्रकार — कर्तृवाच्य (कर्ता में प्रथमा), कर्मवाच्य (कर्ता में तृतीया, कर्म में प्रथमा; क्रिया = धातु + य + आत्मनेपद) और भाववाच्य (कर्म न हो, क्रिया अपरिवर्तनीय) — उनके नियम और उदाहरण सहित सिखाए गए हैं।
- 06कठिन शब्द: (i) सन्निमित्ते = बहुत अच्छा कारण होने पर; (ii) निस्तारः = (ऋण से) मुक्ति, चुकाना; (iii) परमश्लाघ्यः = परम प्रशंसा के योग्य।
- 07वीरवर का चरित्र: वीरवर अपने वेतन का आधा धर्म-कार्य में, एक-चौथाई दरिद्रों में और एक-चौथाई पत्नी को देता था; वह दिन-रात राजद्वार पर प्रहरी के रूप में सेवा करता था — यह उसकी निष्ठा और दानशीलता दर्शाता है।
Frequently asked questions
01सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः) पाठ किस बारे में है?
यह पाठ राजा शूद्रक के राजपुरुष वीरवर और उसके परिवार की त्याग-कथा है। राजा की आयु बचाने के लिए वीरवर का पूरा परिवार देवी सर्वमंगला को स्वयं को अर्पित कर देता है। देवी प्रसन्न होकर सबको जीवित करती है और राजा वीरवर को समग्र कर्णाटक प्रदेश देता है।
02वीरवर कौन था और वह अपना वेतन कैसे खर्च करता था?
वीरवर राजा शूद्रक का राजपुरुष था। उसे चार सौ सुवर्ण (सुवर्णशतचतुष्टयं) वेतन मिलता था। इसका आधा वह देव-कार्य में लगाता था, एक-चौथाई दरिद्रों में बाँटता था और शेष एक-चौथाई पत्नी को देता था।
03राजलक्ष्मी ने वीरवर को क्या बताया?
राजलक्ष्मी ने बताया कि राजा शूद्रक की आयु केवल तीन दिन शेष है। यदि वीरवर अपनी सबसे प्रिय वस्तु देवी सर्वमंगला को उपहार-रूप में अर्पित करे, तो राजा सौ वर्ष तक जीवित रहेगा।
04शक्तिधर ने पिता की बात सुनकर क्या कहा?
शक्तिधर ने प्रसन्नतापूर्वक (सानन्दम्) कहा कि वह जानता है वीरवर की सबसे प्रिय वस्तु वही (पुत्र) है। उसने कहा कि राष्ट्र और राजा की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व लगाना परम प्रशंसनीय (परमश्लाघ्यः) है।
05'सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति' श्लोक का अर्थ क्या है?
इस श्लोक का अर्थ है: बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों के लिए (परार्थे) अपना धन और जीवन भी त्याग सकता है। जब शरीर का नाश निश्चित है, तब किसी उत्तम कारण (सन्निमित्ते) के लिए किया गया त्याग ही श्रेष्ठ (वरं) है।
06देवी सर्वमंगला क्यों प्रसन्न हुईं और उन्होंने क्या कहा?
देवी ने कहा कि वे वीरवर के सत्त्वोत्कर्ष (सत्त्वगुण की पराकाष्ठा) और भृत्यवात्सल्य (सेवक के प्रति स्नेह) से परम प्रसन्न हैं। उन्होंने राजा को 'विजयी भव' कहा और वीरवर तथा उसके पूरे परिवार को जीवित कर दिया।
07राजा शूद्रक ने वीरवर को क्या पुरस्कार दिया?
राजा शूद्रक ने परम प्रीतिपूर्वक (परमां प्रीतिं गतो) वीरवर को समग्र कर्णाटक प्रदेश (समग्रकर्णाटप्रदेशं) पुरस्कार में दिया।
08इस पाठ में कर्मवाच्य कैसे बनता है?
कर्मवाच्य में कर्ता (करने वाले) को तृतीया विभक्ति लगती है, कर्म (जिसपर क्रिया हो) को प्रथमा विभक्ति लगती है और क्रियापद का रूप 'धातु + य + आत्मनेपद' होता है। जैसे — 'बालकेन ग्रामः गम्यते' (बालक के द्वारा गाँव जाया जाता है)।
09भाववाच्य और कर्मवाच्य में क्या अन्तर है?
कर्मवाच्य में कर्म-पद होता है (जिस पर क्रिया होती है), जबकि भाववाच्य में कोई कर्म-पद नहीं होता। भाववाच्य में कर्ता को तृतीया विभक्ति लगती है और क्रियापद अपरिवर्तनीय (प्रथमपुरुष एकवचन) रहता है, जैसे — 'बालकेन हस्यते', 'बालकैः हस्यते' (दोनों में 'हस्यते' नहीं बदलता)।
10Sannimitte varam tyagah chapter mein kitne shlok hain?
पाठ में दो श्लोक हैं। पहला श्लोक शक्तिधर बोलता है — 'धनानि जीवितञ्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत्...' और दूसरा राजा शूद्रक के मन की बात है — 'जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः...'।
11वेदरता और वीरवती का पाठ में क्या योगदान है?
वेदरता (पत्नी) ने कहा कि यह उनके कुल की परम्परा के अनुकूल है और इसी में स्वामी के वर्तन का निस्तार (चुकाना) है। वीरवती (पुत्री) ने भी प्रसन्नता से इस कार्य में देरी न करने की बात कही। दोनों ने स्वेच्छापूर्वक परिवार के साथ देवी को स्वयं को अर्पित किया।
12'निस्तारः', 'सानन्दम्' और 'दुहितरम्' शब्दों का अर्थ क्या है?
निस्तारः = ऋण से मुक्ति, चुकाना; सानन्दम् = प्रसन्नता के साथ (happily); दुहितरम् = बेटी को (daughter)। ये शब्द पाठ की शब्दार्थ सूची में दिए गए हैं।
13क्या यह अध्याय की PDF मुफ़्त है?
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