Class 8 Sanskrit

Chapter 12 — सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते

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Overview

Summary

Chapter 12 of the Class 8 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Samyagvarnaprayogena Brahmaloke Mahiyate' (सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते), शुद्ध वर्णोच्चारण के महत्त्व पर केंद्रित है। यह इन्द्र-वृत्रासुर की कथा और पाँच श्लोकों द्वारा सिखाता है कि सम्यक् उच्चारण से व्यक्ति समाज में सम्मान पाता है।

  • स्वर-भेद से अर्थ-परिवर्तनवृत्रासुर के यज्ञ में ऋत्विजों द्वारा 'इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व' का स्वर बदल देने से अर्थ पलट गया और इन्द्र का बल बढ़ा। एक वर्ण के भेद से अर्थ बदल जाता है — स्वजनः/श्वजनः, सकृत्/शकृत् — यही उच्चारण-शुद्धि का महत्त्व है।
  • उत्तम एवं अधम पाठकउत्तम पाठक के छह गुण — माधुर्य, अक्षरव्यक्ति, पदच्छेद, सुस्वर, धैर्य, लयसमर्थता। अधम पाठक के छह दोष — गीती, शीघ्री, शिरःकम्पी, लिखितपाठक, अनर्थज्ञ, अल्पकण्ठ। सम्यक् पाठ ही समाज में प्रतिष्ठा देता है।
  • षड् वेदाङ्ग परिचयपाठ के अंत में छः वेदाङ्गों का परिचय है — शिक्षा (उच्चारण-विधि), कल्प (यज्ञ-क्रिया), व्याकरण (भाषा-नियम), निरुक्त (शब्द-व्युत्पत्ति), छन्द (मात्रा-ताल) और ज्योतिष (नक्षत्र-गति)।
Essentials

Key points & formulas

  1. 01कथावस्तु: वृत्रासुर ने यज्ञ में 'इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व' मंत्र का पाठ कराया; ऋत्विजों ने स्वर परिवर्तित किया जिससे अर्थ पलट गया, इन्द्र का बल बढ़ा और उन्होंने वज्र से वृत्रासुर का वध किया।
  2. 02केंद्रीय शिक्षा: 'सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते' — शुद्ध एवं स्पष्ट उच्चारण करने वाले को समाज में सम्मान प्राप्त होता है।
  3. 03एक वर्ण के भेद से अर्थ बदल जाता है: स्वजनः (बन्धु) → श्वजनः (कुत्ता); सकृत् (एक बार) → शकृत् (विष्ठा); सकलम् (पूरा) → शकलम् (टुकड़ा)।
  4. 04उत्तम पाठक के छह गुण (श्लोक ४): माधुर्यम्, अक्षरव्यक्तिः, पदच्छेदः, सुस्वरः, धैर्यम्, लयसमर्थम्।
  5. 05अधम पाठक के छह दोष (श्लोक ५): गीती (गाकर पढ़ना), शीघ्री (बहुत तेज पढ़ना), शिरःकम्पी (सिर हिलाना), लिखितपाठकः (लिखकर पढ़ना), अनर्थज्ञः (अर्थ न जानना), अल्पकण्ठः (धीमी आवाज)।
  6. 06कठिन शब्द: ऋत्विजः = पुरोहित; महीयते = सम्मानित होता है; व्याघ्री = बाघिन; अव्यक्ताः = अस्पष्ट; पीडिताः = आवश्यकता से अधिक प्रयत्न से बोले गए।
  7. 07पाठ में छः वेदाङ्गों का परिचय: शिक्षा (उच्चारण-विधि), कल्प (यज्ञ-क्रिया), व्याकरण (भाषा-नियम), निरुक्त (शब्द-व्युत्पत्ति), छन्द (मात्रा-ताल), ज्योतिष (नक्षत्र-गति)।
Questions

Frequently asked questions

01

samyagvarnaprayogena brahmaloke mahiyate paath ka arth kya hai?

इस पाठ का अर्थ है — सही ढंग से वर्णों का उच्चारण करने से व्यक्ति ब्रह्मलोक में पूजित होता है। पाठ इन्द्र-वृत्रासुर की कथा और श्लोकों के द्वारा शुद्ध उच्चारण का महत्त्व समझाता है।

02

uttam pathak ke 6 gun kaun se hain Class 8 Sanskrit mein?

श्लोक ४ के अनुसार उत्तम पाठक के छह गुण हैं: (१) माधुर्यम् — मधुर उच्चारण, (२) अक्षरव्यक्तिः — अक्षरों की स्पष्टता, (३) पदच्छेदः — उचित स्थान पर शब्द-विराम, (४) सुस्वरः — सभी को सुनाई देने वाला मधुर स्वर, (५) धैर्यम् — आत्मविश्वास से पढ़ना, (६) लयसमर्थम् — विषय में तल्लीनता।

03

इस पाठ की कथा में कौन-कौन से पात्र हैं?

इस कथा के प्रमुख पात्र हैं — देवताओं के राजा इन्द्र, असुरों के राजा वृत्रासुर, और ऋत्विज (पुरोहित)। वृत्रासुर ने यज्ञ कराया, ऋत्विजों ने स्वर बदला, और इन्द्र ने वज्र से वृत्रासुर का वध किया।

04

'स्वजनः' और 'श्वजनः' में क्या अंतर है?

'स्वजनः' का अर्थ है बन्धु (अपना व्यक्ति), जबकि 'श्वजनः' का अर्थ है शुनक (कुत्ता)। केवल एक वर्ण के भेद से अर्थ सर्वथा अलग हो जाता है — यह उदाहरण व्याकरण की अनिवार्यता दर्शाता है।

05

'सकृत्' और 'शकृत्' में क्या अंतर है?

'सकृत्' का अर्थ है एकवारम् (एक बार), जबकि 'शकृत्' का अर्थ है मलम् (विष्ठा)। यह उदाहरण बताता है कि उच्चारण की एक छोटी-सी गलती कितना हास्यास्पद या अनर्थकारी परिणाम दे सकती है।

06

'सकलम्' और 'शकलम्' में क्या भेद है?

'सकलम्' का अर्थ है सम्पूर्णम् (पूरा), जबकि 'शकलम्' का अर्थ है खण्डम् (टुकड़ा)। एक वर्ण के उच्चारण-भेद से विपरीत अर्थ उत्पन्न हो जाता है।

07

पाठ में बाघिन (व्याघ्री) का उदाहरण क्यों दिया गया है?

बाघिन अपने शावकों को तीखे दाँतों से उठाती है — न इतने जोर से कि शावक को चोट लगे, और न इतने ढीले से कि वे गिर जाएँ। इसी प्रकार वर्णों का उच्चारण भी न अति-कठोर (पीडित) होना चाहिए और न अति-शिथिल (अव्यक्त) — संतुलित उच्चारण ही श्रेष्ठ है।

08

अधम पाठक के छह दोष कौन-कौन से हैं?

श्लोक ५ के अनुसार: (१) गीती — गाने की तरह पढ़ना, (२) शीघ्री — बहुत तेज पढ़ना, (३) शिरःकम्पी — सिर हिलाकर पढ़ना, (४) लिखितपाठकः — लिखकर पढ़ना, (५) अनर्थज्ञः — अर्थ जाने बिना पढ़ना, (६) अल्पकण्ठः — बहुत धीमी आवाज में पढ़ना।

09

व्याकरण क्यों अवश्य पढ़ना चाहिए?

पाठ के प्रथम श्लोक में कहा गया है — 'यद्यपि बहु नाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्।' अर्थात् यदि बहुत विषय न पढ़ सको तो भी व्याकरण अवश्य पढ़ो। बिना व्याकरण के उच्चारण-दोष से 'स्वजन' का अर्थ 'श्वजन' (कुत्ता) जैसी गलतियाँ हो सकती हैं।

10

'महीयते' और 'ऋत्विजः' का अर्थ क्या है?

'महीयते' का अर्थ है — सम्मानित होता है / पूजित होता है। 'ऋत्विजः' का अर्थ है पुरोहित (Priests) — यज्ञ में मंत्रोच्चारण करने वाले विद्वान।

11

इस पाठ में कौन-कौन से वेदाङ्गों का परिचय दिया गया है?

पाठ में 'अत्र इदम् अवधेयम्' खंड के अंतर्गत छः वेदाङ्गों का परिचय है: (१) शिक्षा — वर्णोच्चारण-विधि, स्वर, विराम, (२) कल्प — यज्ञ-क्रियाविधि, (३) व्याकरण — भाषा-नियम, (४) निरुक्त — शब्द-व्युत्पत्ति, (५) छन्द — मात्रा-ताल, (६) ज्योतिष — सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रों की गति।

12

इन्द्र और वृत्रासुर की कथा से क्या शिक्षा मिलती है?

स्वर-परिवर्तन से मंत्र का सम्पूर्ण अर्थ बदल गया। इससे यह शिक्षा मिलती है कि उच्चारण में एक छोटी-सी भी त्रुटि परिणाम को पूरी तरह बदल सकती है। अतः भाषणकाले और पठनकाले शुद्ध उच्चारण अनिवार्य है।

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