SanskritClass 8

Deepakam (दीपकम्)

2026-27 Edition16 Chapters

Chapter notes

What you'll learn in Deepakam (दीपकम्)

A quick revision map of Deepakam (दीपकम्) — the core idea and five key takeaways from each chapter. Tap any chapter to read the full NCERT PDF and detailed notes.

01

संगच्छध्वं संवदध्वम्

Chapter 1 of the Class 8 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Sangacchadhvam Samvadadhvam' (संगच्छध्वं संवदध्वम्), ऋग्वेद के 'संज्ञान-सूक्त' (सूक्त १०.१९१) के तीन मन्त्रों को प्रस्तुत करता है। यह पाठ मिलकर चलने, एकस्वर से बोलने और परस्पर मनों में सामरस्य रखने की शिक्षा देता है।

  • 1पाठ का स्रोत: ऋग्वेद के दशम मण्डल का सूक्त १०.१९१, जो 'संज्ञान-सूक्त' तथा 'संघटन-सूक्त' नाम से प्रसिद्ध है।
  • 2केंद्रीय शिक्षा: परिवार, गण, समाज, राष्ट्र और विश्व में वैमनस्य छोड़कर ऐक्यभाव से मिलकर रहें, एकस्वर से बोलें और मनों में सामरस्य बनाए रखें।
  • 3पाठ-प्रवेश: विद्यालय के क्रीडोत्सव में पादकन्दुक-क्रीडा की विजय का संवाद — विजय का कारण था परस्पर सामञ्जस्य, जबकि विपक्षी दल में मनोभेद और द्वेषभाव था।
  • 4प्रमुख मन्त्र: "संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् । देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ॥" (मन्त्र १) — सभी मिलकर आगे बढ़ें और एक-दूसरे के मनोभावों को समझें।
  • 5कठिन शब्द: संगच्छध्वम् = मिलकर चलो; आकूतिः = संकल्प; अभ्युदयम् = लौकिक उन्नति; हविषा = प्रार्थनापूर्वक समर्पण (यज्ञाहुति)।
02

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका

Chapter 2 of the Class 8 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Alpanamapi Vastunam Samhatih Karyasadhika' (अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका), हितोपदेश के मित्रलाभ-प्रकरण की कपोत-मूषक कथा है। यह सिखाती है कि छोटी शक्तियाँ भी एकजुट होकर बड़े-से-बड़ा लक्ष्य सिद्ध कर सकती हैं।

  • 1कथावस्तु (बाहरी): कुछ मित्र ग्रीष्मावकाश में उत्तराखण्ड के गौरीकुण्ड से केदारक्षेत्र चढ़ रहे थे; वर्षारम्भ में तेज बारिश, सेतु-भंग और पर्वत-स्खलन हो गया। सभी भयभीत हुए, किन्तु नायक ने धैर्य रखा और हितोपदेश की कथा सुनाई।
  • 2आन्तरिक कथा (हितोपदेश, मित्रलाभप्रकरण): गोदावरी तट के शाल्मली वृक्ष पर रहने वाले कपोतराज चित्रग्रीव और उसके साथी आकाश में उड़ रहे थे। शिकारी ने निर्जन वन में तण्डुलकण (चावल के दाने) बिखेरकर जाल फैलाया। चित्रग्रीव के सावधान करने पर भी लोभवश कपोत उतरे और जाल में फँस गए।
  • 3केंद्रीय शिक्षा (नीतिवचन): 'अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका' — चित्रग्रीव ने सभी को समझाया कि एकचित्त होकर सब मिलकर जाल उठाकर उड़ें। सभी पक्षियों ने ऐसा ही किया, व्याध उन्हें पकड़ न सका। एकता से असम्भव कार्य भी सिद्ध होता है।
  • 4प्रमुख पात्र: चित्रग्रीव (कपोतराज — नायकधर्म और आश्रितवात्सल्य का प्रतीक), हिरण्यक (मूषकराज — चित्रग्रीव का प्रिय मित्र जो दाँत से बन्धन काटता है), व्याधः (शिकारी — प्रतिकूल पात्र), नायकः (छात्र-मित्रों का नेता जो कथा सुनाता है)।
  • 5महत्त्वपूर्ण श्लोक: 'विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः। यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥' — विपत्ति में धैर्य, समृद्धि में क्षमा, सभा में वाक्पटुता — ये महापुरुषों के स्वाभाविक गुण हैं।
03

सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु

Chapter 3 of the Class 8 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Subhashitarasam Pitva Jivanam Saphalam Kuru' (सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु), आठ नीतिश्लोकों का संग्रह है जिनका अर्थ, अन्वय और भावार्थ दिया गया है। इनके अध्ययन से जीवन को सफल बनाने की प्रेरणा दी गई है।

  • 1पाठ का विषय: आठ सुभाषित (नीतिश्लोक) जो आदर्श मानव-जीवन के निर्माण का मार्गदर्शन करते हैं; पितामही और पोती के संवाद द्वारा सुभाषितों का परिचय और उनके पठन का महत्त्व बताया गया है।
  • 2केंद्रीय शिक्षा: सुभाषितों को पढ़कर उनका जीवन में प्रयोग करने से कर्तव्य-अकर्तव्य का स्पष्ट मार्गदर्शन मिलता है और जीवन सुखमय तथा सफल बनता है।
  • 3प्रमुख पात्र: पितामही (दादी) — जो सुभाषितों का ज्ञान देती हैं; वत्से (पोती) — जिज्ञासु शिष्या जो प्रश्न पूछती है।
  • 4महत्त्वपूर्ण श्लोक: 'गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः । पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः करी च सिंहस्य बलं न मूषकः ॥' — गुणवान् ही गुण पहचानता है, जैसे कोयल वसंत का गुण जानती है पर कौआ नहीं; हाथी सिंह का बल जानता है पर चूहा नहीं।
  • 5आठ उत्तम गुण जो मनुष्य को प्रकाशित करते हैं: प्रज्ञा (विशेष बुद्धि), कौल्य (अच्छे कुल में जन्म), दम (इन्द्रियसंयम), श्रुत (शास्त्रज्ञान), पराक्रम (वीरता), अबहुभाषिता (कम और सार्थक बोलना), यथाशक्ति दान, और कृतज्ञता।
04

प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः

Chapter 4 of the Class 8 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Pranamyo Deshabhakto Ayam Gopabandhurmahamanah' (प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः), ओडिशा के उत्कलमणि गोपबन्धु दास की जीवनी है। यह उनके निःस्वार्थ जीवन, देशभक्ति और बाढ़पीड़ितों की सेवा का प्रेरणादायक वर्णन करता है।

  • 1विषय: यह पाठ ओडिशा के महान् स्वतन्त्रता-सेनानी और समाजसेवक उत्कलमणि गोपबन्धु दास की जीवनी पर आधारित संस्कृत कथा है, जो संवाद-शैली में प्रस्तुत है।
  • 2केंद्रीय शिक्षा: दूसरों की पीड़ा देखकर तुरन्त सेवा करना — गोपबन्धु ने मरणासन्न पुत्र को छोड़कर बाढ़पीड़ितों की सेवा की और भूखे भिक्षुक को अपना भोजन दे दिया।
  • 3प्रमुख व्यक्तित्व: गोपबन्धु दास — जन्म 09/10/1877, सुआण्डो ग्राम, पुरी, ओडिशा; पञ्चमित्रों में से एक; सत्यवादि-वनविद्यालय के संस्थापक; महात्मा गान्धी की प्रेरणा से स्वतन्त्रता-आन्दोलन में सहभागी; दो वर्ष कारावास; 17/06/1928 को निधन।
  • 4प्रसिद्ध श्लोक: "स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः, स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु।" — अर्थात् मेरा शरीर देश की मिट्टी में मिल जाए और देशवासी मेरे पथ पर चलें।
  • 5व्याकरण — पूर्वरूपसन्धि: जब पद के अन्त में 'ए' या 'ओ' हो और अगले पद का प्रथम वर्ण 'अ' हो, तो उस 'अ' के स्थान पर अवग्रह 'ऽ' का प्रयोग होता है। जैसे: देशभक्तो + अयम् = देशभक्तोऽयम्।
05

गीता सुगीता कर्तव्या

Chapter 5 of the Class 8 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Gita Sugita Kartavya' (गीता सुगीता कर्तव्या), श्रीमद्भगवद्गीता के आठ चुने हुए श्लोकों को संवाद शैली में प्रस्तुत करता है। यह स्थितप्रज्ञता, क्रोध के दुष्परिणाम, ज्ञान-प्राप्ति के उपाय और वाङ्मय तप की शिक्षा देता है।

  • 1पाठ की विषयवस्तु: कुरुक्षेत्र में गीता-जयन्ती महोत्सव के अवसर पर रमेश और उसके पिता के संवाद के माध्यम से भगवद्गीता का परिचय कराया गया है; पाठ में आठ गीता-श्लोकों के पदच्छेद, अन्वय और भावार्थ दिए गए हैं।
  • 2केंद्रीय शिक्षा: गीता को उत्तम भाव से पढ़कर उसके उपदेशों को जीवन और कार्यक्षेत्र दोनों में अनुपालन करना चाहिए — यही 'सुगीता कर्तव्या' का भाव है।
  • 3प्रमुख पात्र: रमेश (जिज्ञासु बालक), उसके पिता (ज्ञानदाता), भगवान श्रीकृष्ण (गीता के उपदेशक) और अर्जुन (उपदेश के प्राप्तकर्ता)।
  • 4क्रोध की हानिकारक शृंखला (श्लोक २): क्रोध → सम्मोह (अविवेक) → स्मृतिविभ्रम → बुद्धिनाश → सर्वनाश — क्रोध अंततः मनुष्य को विनाश की ओर ले जाता है।
  • 5ज्ञान-प्राप्ति के तीन उपाय (श्लोक ३): प्रणिपात (विनम्र नमस्कार), परिप्रश्न (जिज्ञासा से पुनः-पुनः प्रश्न) और सेवा — इन तीनों से तत्त्वदर्शी गुरु ज्ञान देते हैं।
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डिजिभारतम् – युगपरिवर्तनम्

Chapter 6 of the Class 8 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Digibharatam Yugaparivartanam' (डिजिभारतम् युगपरिवर्तनम्), प्रधानमन्त्री संग्रहालय की पृष्ठभूमि में डिजिटल भारत की प्रगति को संवाद रूप में प्रस्तुत करता है। यह शासन, वित्त, शिक्षा और कृषि में डिजिटल परिवर्तन के साथ क्त-प्रत्यय और शतृ-प्रत्यय भी सिखाता है।

  • 1विषय एवं कथावस्तु: नई दिल्ली के प्रधानमन्त्री संग्रहालय में शिक्षक और छात्र हॉलोग्राम, AR, VR, AI-संवादयन्त्र और डिजिटल प्रक्षेपण चलचित्र देखते हैं; फिर कक्षा में डिजिटल भारत के विभिन्न क्षेत्रों पर विस्तृत चर्चा करते हैं।
  • 2प्रमुख पात्र: अध्यापक, यशिका, अथर्वः, भास्करः, वेदिका, श्रेया और राघवः।
  • 3डिजिटल भारत के मुख्य क्षेत्र: शासन (DigiLocker, UMANG, MyGov, CoWIN), वित्तीय समावेशन (UPI, FASTag, RuPay, जनधन योजना), शिक्षा (DIKSHA, SWAYAM, SWAYAM PRABHA, ePathshala, NISHTHA, PM e-VIDYA), कृषि (e-NAM, PM-KISAN, ड्रोन प्रौद्योगिकी)।
  • 4साइबर सुरक्षा की चेतावनी: लोग प्रायः लोभ या भय के कारण साइबर अपराध (साङ्गणिक-अपराध) के शिकार होते हैं; डिजिटल साक्षरता आवश्यक है।
  • 5व्याकरण: क्त-प्रत्यय — भूतकाल में कर्मवाच्य/भाववाच्य के लिए, तीनों लिंगों में (उदा. पठितः/पठिता/पठितम्); शतृ-प्रत्यय — वर्तमानकाल में, केवल परस्मैपदी धातुओं के साथ (उदा. पश्यन्, जानन्)।
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मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा

Chapter 7 of the Class 8 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Manjulamanjusha Sundarasurabhasha' (मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा), संस्कृत भाषा की स्तुति में रचित एक गीत है। यह संस्कृत को सुंदर दिव्य भाषा तथा ज्ञान-विज्ञान, साहित्य और संस्कृति की जननी बताता है।

  • 1पाठ का विषय: यह दीपकम् कक्षा 8 का सातवाँ पाठ है — संस्कृत भाषा की स्तुति में रचित चार पदों वाला गीत।
  • 2संस्कृतदिवस का अवसर: श्रावणी पूर्णिमा को संस्कृतदिवस मनाया जाता है; दो बालिकाएँ (भगिनि और ओमिते) इस अवसर पर गीतगायन प्रतियोगिता में भाग लेने की बात करती हैं।
  • 3प्रमुख नाम: वेदव्यास और वाल्मीकि (रामायण-महाभारत के रचयिता), कालिदास और बाण (काव्य रचयिता) — इन सभी ने संस्कृत को समृद्ध किया।
  • 4मुख्य पद: 'मुनिवरविकसितकविवरविलसित-मञ्जुलमञ्जूषा, सुन्दरसुरभाषा। अयि मातस्तव पोषणक्षमता मम वचनातीता, सुन्दरसुरभाषा ॥'
  • 5नव रस: संस्कृत साहित्य में शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शान्त — ये नौ रस हैं।
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पश्यत कोणमैशान्यं भारतस्य मनोहरम्

Chapter 8 of the Class 8 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Pashyata Konamaishanyam Bharatasya Manoharam' (पश्यत कोणमैशान्यं भारतस्य मनोहरम्), एक कक्षा-संवाद के माध्यम से भारत के पूर्वोत्तर के आठ राज्यों का परिचय देता है। यह उनकी प्राकृतिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विशेषताओं से छात्रों को परिचित कराता है।

  • 1यह पाठ कक्षा-संवाद (dialogue) है जिसमें अध्यापिका और स्वरा, श्रीश, मालती, अभिनव, मृदुल आदि छात्र भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की जानकारी लेते हैं।
  • 2पूर्वोत्तर के आठ राज्यों को 'सप्तभगिन्यः एकः भ्राता च' कहा जाता है — सात बहनें (अरुणाचलप्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैण्ड, त्रिपुरा) और एक भाई सिक्किम। यह नाम सामाजिक-सांस्कृतिक साम्य और भौगोलिक वैशिष्ट्य के कारण प्रतीकात्मक रूप से दिया गया है।
  • 3ये राज्य पूर्वहिमालय और पटकाई-नागपर्वत श्रेणियों में स्थित हैं; बराक, ब्रह्मपुत्र आदि नदियाँ यहाँ बहती हैं तथा पठार, उपत्यकाएँ और पर्वतश्रेणियाँ भू-वैविध्य को दर्शाते हैं।
  • 4यहाँ गारो, खासी, नागा, मिजो, लेप्चा आदि अनेक जनजातियाँ निवास करती हैं जो बहुभाषी, उत्सव-परम्परा से युक्त और अपनी कलाओं में निपुण हैं।
  • 5वंशवृक्ष (बाँस) का इस क्षेत्र में बाहुल्य है — वस्त्र, आभूषण से लेकर गृहनिर्माण तक वंशवृक्ष का उपयोग होता है और वंशोद्योग अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुका है।
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कोऽरुक्? कोऽरुक्? कोऽरुक्?

Chapter 9 of the Class 8 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Ko-Aruk? Ko-Aruk? Ko-Aruk?' (कोऽरुक्? कोऽरुक्? कोऽरुक्?), वह कथा है जिसमें भगवान् धन्वन्तरि शुकरूप धारण कर श्रेष्ठ वैद्य की खोज करते हैं। इसमें वैद्य वाग्भट स्वस्थ जीवन के तीन सूत्र — हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक् — प्रस्तुत करते हैं।

  • 1कथावस्तु: भगवान् धन्वन्तरि मनोहर शुकरूप धारण करके प्रतिग्राम भ्रमण करते हैं और 'कोऽरुक्?' पूछकर श्रेष्ठ वैद्य की परीक्षा लेते हैं।
  • 2केंद्रीय शिक्षा: स्वस्थ रहने के तीन सूत्र — हितभुक् (हितकारक भोजन करने वाला), मितभुक् (सीमित मात्रा में खाने वाला), ऋतुभुक् (ऋतु के अनुसार उपयुक्त भोजन करने वाला)।
  • 3प्रमुख पात्र: भगवान् धन्वन्तरि (शुकरूप में), वैद्य वाग्भट और उनके जिज्ञासु छात्र।
  • 4व्याकरण: विशेषण और विशेष्य का परिचय; नियम — विशेषण में विशेष्य का लिंग, वचन और विभक्ति समान होती है।
  • 5कठिन शब्द: अरुक् = नीरोग/स्वस्थ; हितभुक् = हितकारक भोजन करने वाला; झटिति = शीघ्र।
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सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः)

Chapter 10 of the Class 8 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Sannimitte Varam Tyagah (Ka-Bhag)' (सन्निमित्ते वरं त्यागः — क-भाग), हितोपदेश की एक कथा है जो कर्तव्यनिष्ठ राजपुत्र वीरवर की स्वामिभक्ति दर्शाती है। यह उचित कारण के लिए त्याग की प्रेरणा देती है।

  • 1यह पाठ 'हितोपदेश' नामक प्रसिद्ध संस्कृत कथाग्रन्थ से लिया गया है, जिसमें कथाओं के माध्यम से जीवन के उपदेश दिए जाते हैं।
  • 2प्रमुख पात्र: वीरवर (कर्तव्यनिष्ठ राजपुत्र-नायक), राजा शूद्रक (महापराक्रमी, नानाशास्त्रवित्, पूतचरित्र), वेदरता (वीरवर की पत्नी), शक्तिधर (पुत्र), वीरवती (पुत्री), राजलक्ष्मी, और मन्त्री।
  • 3केंद्रीय शिक्षा: 'सन्निमित्ते वरं त्यागः' — उचित और अच्छे कारण के लिए त्याग करना श्रेष्ठ है; स्वामिभक्ति और राष्ट्र-समर्पण प्रेरणीय हैं।
  • 4वीरवर अपना वेतन (सुवर्णशतचतुष्टयम् — प्रतिदिन चार सौ स्वर्णमुद्राएँ) तीन भागों में बाँटता है: आधा देवताओं को, शेष का आधा दरिद्रों को, और बाकी पत्नी को।
  • 5प्रमुख कठिन शब्द और अर्थ: महीपतिः = राजा; अहर्निशम् = दिन-रात; पञ्चत्वम् = मृत्यु; दुःसाध्या = कठिनाई से पालन करने योग्य; सहासवदनेन = हँसते हुए मुख से।
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सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)

Chapter 11 of the Class 8 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Sannimitte Varam Tyagah (Kha-Bhag)' (सन्निमित्ते वरं त्यागः — ख-भाग), राजरक्षक वीरवर और उसके परिवार के नि:स्वार्थ बलिदान की कथा का दूसरा भाग है। यह सिखाता है कि उचित कारण के लिए किया गया त्याग सर्वश्रेष्ठ होता है।

  • 1विषय/कथावस्तु: यह पाठ राजा शूद्रक के स्वामिभक्त राजपुरुष वीरवर और उसके पूरे परिवार की नि:स्वार्थ त्याग-कथा है जो संवाद-शैली में प्रस्तुत की गई है।
  • 2केंद्रीय शिक्षा (मुख्य श्लोक): 'धनानि जीवितञ्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् / सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति' — बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों के लिए धन और जीवन त्याग सकता है, क्योंकि शरीर का नाश निश्चित है और उचित कारण के लिए किया गया त्याग श्रेष्ठ है।
  • 3प्रमुख पात्र: वीरवर (राजा शूद्रक का स्वामिभक्त राजपुरुष), शक्तिधर (वीरवर का पुत्र), वेदरता (वीरवर की पत्नी), वीरवती (वीरवर की पुत्री), राजा शूद्रक, राजलक्ष्मी और देवी सर्वमंगला।
  • 4कथा-परिणाम: देवी सर्वमंगला वीरवर के सत्त्वोत्कर्ष (सत्त्वगुण की पराकाष्ठा) और राजा के भृत्यवात्सल्य (सेवक के प्रति स्नेह) से प्रसन्न होकर परिवार को जीवन लौटाती है; राजा वीरवर को समग्र कर्णाटक प्रदेश पुरस्कार में देता है।
  • 5व्याकरण-विषय: पाठ में वाच्य के तीन प्रकार — कर्तृवाच्य (कर्ता में प्रथमा), कर्मवाच्य (कर्ता में तृतीया, कर्म में प्रथमा; क्रिया = धातु + य + आत्मनेपद) और भाववाच्य (कर्म न हो, क्रिया अपरिवर्तनीय) — उनके नियम और उदाहरण सहित सिखाए गए हैं।
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सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते

Chapter 12 of the Class 8 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Samyagvarnaprayogena Brahmaloke Mahiyate' (सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते), शुद्ध वर्णोच्चारण के महत्त्व पर केंद्रित है। यह इन्द्र-वृत्रासुर की कथा और पाँच श्लोकों द्वारा सिखाता है कि सम्यक् उच्चारण से व्यक्ति समाज में सम्मान पाता है।

  • 1कथावस्तु: वृत्रासुर ने यज्ञ में 'इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व' मंत्र का पाठ कराया; ऋत्विजों ने स्वर परिवर्तित किया जिससे अर्थ पलट गया, इन्द्र का बल बढ़ा और उन्होंने वज्र से वृत्रासुर का वध किया।
  • 2केंद्रीय शिक्षा: 'सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते' — शुद्ध एवं स्पष्ट उच्चारण करने वाले को समाज में सम्मान प्राप्त होता है।
  • 3एक वर्ण के भेद से अर्थ बदल जाता है: स्वजनः (बन्धु) → श्वजनः (कुत्ता); सकृत् (एक बार) → शकृत् (विष्ठा); सकलम् (पूरा) → शकलम् (टुकड़ा)।
  • 4उत्तम पाठक के छह गुण (श्लोक ४): माधुर्यम्, अक्षरव्यक्तिः, पदच्छेदः, सुस्वरः, धैर्यम्, लयसमर्थम्।
  • 5अधम पाठक के छह दोष (श्लोक ५): गीती (गाकर पढ़ना), शीघ्री (बहुत तेज पढ़ना), शिरःकम्पी (सिर हिलाना), लिखितपाठकः (लिखकर पढ़ना), अनर्थज्ञः (अर्थ न जानना), अल्पकण्ठः (धीमी आवाज)।
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वर्णोच्चारण-शिक्षा १

Chapter 13 of the Class 8 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Varnoccharana-shiksha-1' (वर्णोच्चारण-शिक्षा-१), संस्कृत ध्वनिशास्त्र का पहला भाग है जो वर्णों के शुद्ध उच्चारण का विज्ञान सिखाता है। इसमें ध्वनि-उत्पत्ति की चार-चरण प्रक्रिया, छः उच्चारण-स्थान तथा स्थान-करण की अवधारणाएँ पाणिनीय सूत्रों सहित समझाई गई हैं।

  • 1व्याकरण-विषय: यह पाठ संस्कृत ध्वनिशास्त्र (शिक्षा = Phonetics & Phonology) का पहला भाग है, जो वर्णों के शुद्ध और निर्दुष्ट उच्चारण का विज्ञान सिखाता है।
  • 2ध्वनि-उत्पत्ति के चार तन्त्र: नाभि-प्रदेश की मांसपेशियाँ उरः को दबाती हैं → उरः फेफड़ों से वायु ऊपर भेजता है → वायु कण्ठ-बिल (स्वरतन्त्री) से गुजरता है → आस्य में प्रवेश कर किसी एक स्थान पर वर्ण-रूप में प्रकट होता है।
  • 3छः उच्चारण-स्थान: आस्य में कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त और ओष्ठ (पाँच मुख में) तथा नासिका (छठा स्थान) — ये छः स्थान हैं जहाँ वर्ण उत्पन्न होते हैं।
  • 4करणम् (उच्चारण-उपकरण): तालव्य, मूर्धन्य और दन्त्य वर्णों के लिए जिह्वा करण है — क्रमशः जिह्वा-मध्य, जिह्वा-उपाग्र और जिह्वा-अग्र। कण्ठ्य, ओष्ठ्य और नासिक्य वर्णों के लिए उनका स्व-स्थान ही करण होता है।
  • 5बाँसुरी का उदाहरण: बाँसुरी (मुरली) के छिद्र = स्थान, और बजाने वाली अँगुलियाँ = करण — इस उदाहरण से स्थान तथा करण की भूमिका स्पष्ट की गई है।
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परिशिष्टम् १: व्याकरणम्

Chapter 14 of the Class 8 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Parishishtam 1: Vyakaranam' (परिशिष्टम् १: व्याकरणम्), व्याकरण-संदर्भ परिशिष्ट है। यह उपसर्ग, कृत्-प्रत्यय, विभक्ति और सन्धि के मुख्य नियमों का संक्षिप्त संदर्भ-भाग प्रस्तुत करता है।

  • 1उपसर्गः: संस्कृत में कुल २२ उपसर्ग होते हैं — प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्, निर्, दुस्, दुर्, वि, आङ्, नि, अधि, अपि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि, उप। ये धातु के पहले जोड़े जाते हैं और अर्थ बदल सकते हैं (गच्छति → आगच्छति) या अर्थ को उत्कर्ष दे सकते हैं (शोभते → सुशोभते)।
  • 2कृत्-प्रत्ययाः — क्त्वा और ल्यप्: जब एक ही कर्ता दो काम करे, तब पहले काम में क्त्वा-प्रत्यय लगता है (पठित्वा, लिखित्वा, कृत्वा)। यदि धातु के साथ उपसर्ग हो, तो क्त्वा के स्थान पर ल्यप् प्रयुक्त होता है (प्रणम्य, सम्पूज्य, आनीय)।
  • 3कृत्-प्रत्ययाः — तुमुन् और क्तवतु: तुमुन्-प्रत्यय उद्देश्यार्थक है (पठितुम्, गन्तुम्, स्नातुम्)। क्तवतु-प्रत्यय भूतकालार्थ विशेषण बनाता है और तीनों लिंगों में रूप होते हैं — पुंलिंग (हसितवान्), स्त्रीलिंग (हसितवती), नपुंसकलिंग (हसितवत्)।
  • 4धातु-सारणी: पाठ में पठ्, खाद्, हस्, लिख्, पा, गम्, त्यज्, नी, कृ, घ्रा, स्था, नम्, स्मृ, ज्ञा, दा, दृश्, प्रच्छ्, ग्रह्, वद्, क्रीड् आदि धातुओं की लट्-लकार, क्त्वा, ल्यप्, तुमुन् और क्तवतु-रूपों की सारणी दी गई है।
  • 5विभक्तिः: कारक-विभक्ति में छह कारक — कर्ता (प्रथमा), कर्म (द्वितीया), करण (तृतीया), सम्प्रदान (चतुर्थी), अपादान (पञ्चमी), अधिकरण (सप्तमी)। संबन्ध के लिए षष्ठी, संबोधन के लिए संबोधन-विभक्ति, और विशेष पदों (नमः, सह, परितः, उपरि आदि) के साथ उपपद-विभक्ति होती है।
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परिशिष्टम् २: शब्दरूपाणि

Chapter 15 of the Class 8 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Parishishtam 2: Shabdarupani' (परिशिष्टम् २: शब्दरूपाणि), शब्दरूप-संदर्भ परिशिष्ट है। यह विभिन्न प्रकार के शब्दों के रूप सातों विभक्तियों, तीनों वचनों और तीनों लिङ्गों में प्रस्तुत करता है।

  • 1इकारान्त नपुंसकलिङ्ग शब्द — दधि (दही) और वारि (जल) के रूप सातों विभक्तियों में तीनों वचनों सहित दिए गए हैं; प्रथमा-द्वितीया एकवचन में मूलरूप यथावत् रहता है।
  • 2उकारान्त नपुंसकलिङ्ग शब्द मधु (शहद) के रूप दिए गए हैं, जिनमें आंतरिक परिवर्तन के साथ विभक्तियाँ बनती हैं।
  • 3अनियमित पुंलिङ्ग शब्द — मरुत् (वायु, तकारान्त), राजन् (राजा, नकारान्त), आत्मन् (आत्मा, नकारान्त) और विद्वस् (विद्वान्, सकारान्त) — इनके रूपों में विशेष आन्तरिक परिवर्तन होते हैं जो इस तालिका से स्पष्ट होते हैं।
  • 4शतृ-प्रत्ययान्त कृदन्त शब्द — गच्छत् (जाता हुआ, पुंलिङ्ग) और गच्छन्ती (जाती हुई, स्त्रीलिङ्ग) के विस्तृत रूप दिए गए हैं।
  • 5सर्वनाम-शब्दरूप — भवत्/भवती (आदरणीय 'आप'), यद् (जो — तीनों लिङ्ग) और इदम् (यह — तीनों लिङ्ग) के सभी विभक्ति-रूप प्रस्तुत हैं; कीदृश/कीदृशी ('कैसा') के भी तीनों लिङ्गों के रूप दिए गए हैं।
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परिशिष्टम् ३: धातुरूपाणि

Chapter 16 of the Class 8 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Parishishtam 3: Dhaturupani' (परिशिष्टम् ३: धातुरूपाणि), धातुरूप-संदर्भ परिशिष्ट है। यह परस्मैपद और आत्मनेपद दोनों पक्षों में प्रमुख धातुओं के रूप पाँच लकारों में तथा तीनों वचनों में प्रस्तुत करता है।

  • 1परस्मैपद में सात धातुओं के रूप दिए गए हैं: भू (होना), गम् (जाना), पा (पीना), नी (ले जाना), स्था (खड़े रहना/ठहरना), दृश् (देखना), इष् (चाहना)
  • 2आत्मनेपद में दो धातुओं के रूप दिए गए हैं: सेव् (सेवा करना) और लभ् (पाना/प्राप्त करना)
  • 3पाँच लकारों की तालिकाएँ: लट् (वर्तमान), लृट् (भविष्यत्), लङ् (भूत), लोट् (आज्ञा), विधिलिङ् (चाहिए/उचित है)
  • 4प्रत्येक तालिका में तीन पुरुष (प्रथमपुरुषः, मध्यमपुरुषः, उत्तमपुरुषः) और तीन वचन (एकवचनम्, द्विवचनम्, बहुवचनम्) के रूप दिए गए हैं
  • 5कुछ महत्त्वपूर्ण शब्द-अर्थ: धातुः = क्रिया का मूल रूप; लकारः = काल या अर्थ; पुरुषः = person (प्रथम/मध्यम/उत्तम); वचनम् = number (एक/द्वि/बहु)

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