Summary
Paath 7 — Class 5 Hindi NCERT textbook (Veena / वीणा), 'Mera Bachpan' (मेरा बचपन) written by Premchand — download the PDF aur padhein saaraansh, shabdarth, aur prashn-uttar. Is gadya mein lekhak ne apne gramin bachpan ki yaadein, gully-danda khel, aur Ramleela ke utsav ko yaad kiya hai.
- सारांश — यह पाठ प्रसिद्ध लेखक प्रेमचंद की एक संस्मरणात्मक गद्य-रचना है जिसमें वे अपने बचपन की मीठी यादों को जीवंत करते हैं। वे बताते हैं कि कैसे वे अपने चचेरे भाई हलधर के साथ मौलवी साहब के यहाँ पढ़ने जाते थे, रामलीला की तैयारियों में उत्साह से दौड़-दौड़कर काम करते थे, और गुल्ली-डंडा खेलने में घंटों बिता देते थे। पाठ में ग्रामीण जीवन की सादगी, खुलापन और अमीर-गरीब का भेद न होने का भाव मार्मिक रूप से व्यक्त हुआ है।
- विषय और मूल भाव — पाठ का मूल भाव है — बचपन की निश्छलता, खेल की स्वाभाविक खुशी, और भारतीय परंपरागत खेलों का महत्त्व। प्रेमचंद भारतीय देशज खेलों (गुल्ली-डंडा) की तुलना महँगे विलायती खेलों से करते हैं और यह संदेश देते हैं कि सादे खेलों में ही असली आनंद है। पाठ में यह भी दिखता है कि बचपन के खेलों में वर्ग-भेद, अहंकार और धन का कोई स्थान नहीं होता।
- लेखक-परिचय — यह पाठ मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित है, जो हिंदी और उर्दू साहित्य के महान कथाकार माने जाते हैं। उनकी रचनाएँ सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण जीवन और सामान्य मनुष्य की पीड़ा को केंद्र में रखती हैं। यह पाठ 'रत्न सागर प्रकाशन' से साभार लिया गया है। पाठ की भाषा सरल, प्रवाहमयी है जिसमें कुछ उर्दू शब्द भी स्वाभाविक रूप से आए हैं।
Key points & formulas
- 01लेखक प्रेमचंद ने इस गद्य-संस्मरण में अपने बचपन की ग्रामीण यादों को जीवंत किया है — कच्चा घर, पयाल का बिछौना, नंगे पाँव खेतों में घूमना।
- 02लेखक आठ वर्ष की उम्र में अपने चचेरे भाई हलधर (जो दो साल बड़े थे) के साथ मौलवी साहब के यहाँ पढ़ने जाते थे; सुबह मटर और जौ का चबेना खाकर निकलते थे।
- 03रामलीला की तैयारियों में लेखक बहुत उत्साह से भाग लेते थे — दोपहर से ही पात्रों की सजावट में छोटे-मोटे काम दौड़-दौड़कर करते थे।
- 04गुल्ली-डंडा को लेखक 'सब खेलों का राजा' कहते हैं — इसमें महँगे सामान की जरूरत नहीं, पेड़ की टहनी से ही गुल्ली और डंडा बन जाते हैं।
- 05पाठ में विलायती (विदेशी) खेलों की आलोचना की गई है क्योंकि उनके सामान महँगे होते हैं; लेखक का मत है कि भारतीय खेल बिना पैसे के खेले जा सकते हैं।
- 06गुल्ली-डंडा के खेल में अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं था, अभिमान की गुंजाइश नहीं थी — यह समानता और सरल स्वभाव का प्रतीक है।
- 07कठिन शब्दार्थ — चबेना: चबाकर खाया जाने वाला भुना हुआ अनाज; पयाल: पुआल/घास का बिछौना; विलायती: विदेशी; ऐब: दोष/कमी; जमघट: भीड़।
Frequently asked questions
01पाठ 'मेरा बचपन' के लेखक कौन हैं?
इस पाठ के लेखक प्रेमचंद हैं। यह पाठ रत्न सागर प्रकाशन से साभार लिया गया है।
02पाठ 'मेरा बचपन' किस पुस्तक में है और किस कक्षा के लिए है?
यह पाठ कक्षा 5 की हिंदी पाठ्यपुस्तक वीणा का पाठ 7 है।
03'मेरा बचपन' पाठ का सारांश क्या है?
लेखक प्रेमचंद अपने बचपन की मीठी यादें बताते हैं। वे लिखते हैं कि वे अपने चचेरे भाई हलधर के साथ दूसरे गाँव में मौलवी साहब के यहाँ पढ़ने जाते थे। सुबह मटर और जौ का चबेना लेकर निकलते थे। रामलीला में बहुत उत्साह से छोटे-मोटे काम करते थे। गुल्ली-डंडा उनका सबसे प्रिय खेल था। वे बताते हैं कि भारतीय खेल बिना पैसे के खेले जा सकते हैं, जबकि विलायती खेलों का सामान महँगा होता है। गुल्ली-डंडा खेलने में अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं था।
04लेखक के चचेरे भाई का क्या नाम था और उनकी उम्र कितनी थी?
लेखक के चचेरे भाई का नाम हलधर था। लेखक की उम्र आठ साल थी और हलधर उनसे दो साल बड़े थे, यानी हलधर की उम्र दस साल थी।
05लेखक सुबह पढ़ने जाते समय क्या खाते थे?
लेखक और उनके भाई हलधर प्रातःकाल मटर और जौ का चबेना लेकर पढ़ने जाते थे।
06लेखक को रामलीला में क्यों इतना आनंद आता था?
लेखक के घर के बिलकुल पास ही वह घर था जहाँ रामलीला के पात्रों का रूप-रंग भरा जाता था। दोपहर दो बजे से पात्रों की सजावट शुरू होती थी और लेखक वहाँ जाकर बैठ जाते थे। वे उत्साह से दौड़-दौड़कर छोटे-मोटे काम किया करते थे। यह उत्साह उन्हें बाद में पेंशन लेने जाने में भी नहीं रहा, ऐसा उन्होंने लिखा है।
07लेखक ने गुल्ली-डंडा को सब खेलों का राजा क्यों कहा है?
लेखक ने गुल्ली-डंडा को सब खेलों का राजा इसलिए कहा क्योंकि इसे खेलने के लिए न लॉन की जरूरत होती है, न कोर्ट की और न थापी की। पेड़ से एक टहनी काटकर गुल्ली बना ली और दो आदमी आ गए तो खेल शुरू हो गया। इसमें कोई पैसा नहीं लगता और अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं था।
08लेखक ने विलायती खेलों की क्या कमी बताई है?
लेखक ने कहा कि विलायती खेलों का सामान बहुत महँगा होता है। स्कूलों में हर लड़के से तीन-चार रुपये सालाना केवल खेलने की फीस ली जाती है। जबकि भारतीय खेल जैसे गुल्ली-डंडा बिना दाम-कौड़ी के खेले जा सकते हैं।
09पाठ में 'चबेना' किसे कहते हैं?
चबेना वह खाद्य सामग्री होती है जो चबाकर खाई जाती है। लेखक सुबह मटर और जौ का चबेना लेकर पढ़ने जाते थे। पाठ में बताया गया है कि मकई, चिउड़ा, भेल, भुने हुए दाने, चना, मटर, मुरमुरे आदि सभी चबेने के रूप हैं।
10गुल्ली-डंडा खेलते समय घरवाले क्यों नाराज होते थे?
लेखक गुल्ली-डंडा खेलने में इतने मग्न हो जाते थे कि उन्हें न नहाने की सुध रहती थी और न खाने की। घरवाले बिगड़ रहे थे और पिताजी चौके पर बैठे रोटियों पर अपना क्रोध उतार रहे थे।
11इस पाठ का मुख्य भाव क्या है?
इस पाठ का मुख्य भाव यह है कि बचपन की यादें बहुत मीठी होती हैं और उन्हें कभी नहीं भुलाया जा सकता। साथ ही लेखक यह भी बताते हैं कि भारतीय खेल जैसे गुल्ली-डंडा बिना पैसे के खेले जाते हैं और उनमें अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं होता। हमें अपने देसी खेलों पर गर्व करना चाहिए।
12पाठ में लेखक ने किन-किन बचपन की यादों का उल्लेख किया है?
लेखक ने अपने बचपन की ये यादें बताई हैं — कच्चा टूटा घर, पयाल का बिछौना, नंगे बदन और नंगे पाँव खेतों में घूमना, आम के पेड़ों पर चढ़ना, हलधर के साथ मौलवी साहब के यहाँ पढ़ने जाना, रामलीला में उत्साह से काम करना, और गुल्ली-डंडा खेलना।
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