Summary
Chapter 5 of the Class 11 Sanskrit NCERT textbook (Shashwati), 'Aharavicharah' (आहारविचारः), यह पाठ संस्कृत गद्य में है, जो चरकसंहिता के 'विमानस्थानम्' प्रकरण के 'रसविमान' नामक प्रथम अध्याय से संकलित है। इसमें स्वस्थ जीवन के लिए उचित आहार-विचार के नौ व्यावहारिक नियमों का विवेचन किया गया है।
- आहार — स्वास्थ्य का मूल आधार — चरकसंहिता से लिया गया यह पाठ स्वास्थ्य की आधारशिला समुचित आहार को बताता है — भोजन का प्रकार, उसकी मात्रा और उचित समय का पालन ही निरोग जीवन की कुंजी है, यही पाठ का केंद्रीय आयुर्वेदिक दृष्टिकोण है।
- उष्ण और स्निग्ध भोजन के गुण — गर्म भोजन पेट की अग्नि जगाकर पाचन को सुगम बनाता है, वात को अनुकूल करता है और कफ दूर करता है; घृत-तेल-युक्त स्निग्ध भोजन शरीर की वृद्धि करता है, इंद्रियों को दृढ़, बल को बढ़ा और वर्ण में निखार लाता है।
- मात्रा, समय और एकाग्रता के नियम — उचित मात्रा में तथा पूर्व भोजन के पचने पर किया आहार दोषों को पीड़ित नहीं करता; न अति शीघ्र, न अति विलम्ब से खाएँ, और बिना बोले-हँसे एकाग्र मन से भोजन करें — ये व्यावहारिक नियम स्वस्थ जीवन को सुनिश्चित करते हैं।
Key points & formulas
- 01विधा एवं स्रोत: यह पाठ संस्कृत गद्य (prose) में है, जो चरकसंहिता के 'विमानस्थानम्' प्रकरण के 'रसविमान' नामक प्रथम अध्याय से लिया गया है।
- 02केंद्रीय भाव: स्वास्थ्य का मूल आधार समुचित आहार है; भोजन के प्रकार, उसकी मात्रा और उचित समय का पालन करना आवश्यक है।
- 03उष्ण भोजन (उष्णमश्नीयात्): गर्म भोजन करने से पेट की अग्नि जागती है, भोजन शीघ्र पचता है, वात अनुकूल होता है और कफ दूर होता है।
- 04स्निग्ध भोजन (स्निग्धमश्नीयात्): घृत-तेल से युक्त भोजन शरीर की वृद्धि करता है, इंद्रियों को दृढ़ बनाता है, बल बढ़ाता है और वर्ण में निखार लाता है ('वर्णप्रसादं चाभिनिर्वर्तयति')।
- 05मात्रावत् एवं जीर्णे भोजन: उचित मात्रा में किया भोजन वात-पित्त-कफ को पीड़ित नहीं करता और आयु बढ़ाता है; पूर्व भोजन के बिना पचे नया खाने से सभी दोष शीघ्र बढ़ते हैं।
- 06व्यावहारिक नियम: न अत्यंत जल्दी (नातिद्रुतमश्नीयात्) खाएँ — उत्स्नेह (डकार/उल्टी) होती है; न अत्यंत विलंब से (नातिविलम्बितमश्नीयात्) — भोजन ठंडा होकर विषम रूप से पचता है।
- 07कठिन शब्दार्थ: 'मात्रवत्' = उचित मात्रा में; 'बुभुक्षा' = भोजन की इच्छा; 'अव्यथम्' = बिना कष्ट के सरलता से; 'उत्स्नेहम्' = डकार आना/उल्टी होना।
- 08एकाग्रता का महत्त्व: भोजन करते समय बात करने या हँसने वाले को वही दोष होते हैं जो अत्यंत शीघ्र खाने से होते हैं; इसलिए 'अजल्पन् अहसन् तन्मना भुञ्जीत' — चुप, शांत और एकाग्र मन से खाएँ।
Frequently asked questions
01Aharavicharah path kis granth se liya gaya hai?
यह पाठ चरकसंहिता के 'विमानस्थानम्' प्रकरण के 'रसविमान' नामक प्रथम अध्याय से संकलित है।
02चरकसंहिता में 'विमान' शब्द का क्या अर्थ है?
इस पाठ की भूमिका के अनुसार, यहाँ प्रयुक्त 'विमान' शब्द का तात्पर्य रोगात्मक दोषों एवं ओषधियों के विज्ञान से है।
03उष्ण भोजन करने के क्या लाभ बताए गए हैं?
पाठ के अनुसार उष्ण भोजन स्वादिष्ट लगता है, पेट की अग्नि को जगाता है, शीघ्र पच जाता है, वात को अनुकूल करता है और कफ को दूर करता है।
04स्निग्ध भोजन शरीर पर क्या प्रभाव डालता है?
स्निग्ध (घृत-तेल युक्त) भोजन शरीर की वृद्धि करता है, इंद्रियों को दृढ़ बनाता है, बल बढ़ाता है और वर्ण-सौंदर्य में निखार लाता है।
05मात्रावत् भोजन क्यों करना चाहिए?
मात्रावत् (उचित मात्रा में) किया भोजन वात, पित्त और कफ को पीड़ित नहीं करता, आयु बढ़ाता है, पेट की अग्नि को हानि नहीं पहुँचाता और बिना कष्ट के सरलता से पचता है।
06अजीर्ण में भोजन करने से क्या दोष होते हैं?
अजीर्ण अवस्था में भोजन करने से नया आहार पुराने अपाचित आहार के रस से मिलकर सभी दोषों को शीघ्र बढ़ा देता है।
07'वीर्याविरुद्धमश्नीयात्' का आशय क्या है?
ऐसा भोजन करना चाहिए जिसकी शक्तियाँ परस्पर विरोधी न हों; इससे विरुद्धवीर्य आहार से उत्पन्न विकारों से बचाव होता है।
08भोजन करते समय उचित स्थान का क्या महत्त्व है?
पाठ के अनुसार, प्रिय स्थान पर इच्छित समस्त उपकरणों (जैसे चटनी, अचार आदि) के साथ भोजन करने से अनिष्ट स्थान के मनोविघातकारी भावों से मानसिक कष्ट नहीं होता।
09अतिद्रुत (बहुत तेज़) भोजन करने के क्या दुष्परिणाम होते हैं?
अत्यंत जल्दी खाने से उत्स्नेहन (डकार/उल्टी), भोजन का उचित स्थान पर न पहुँचना और भोजन के सद्गुणों की पहचान न होना — ये दोष होते हैं।
10अतिविलंबित भोजन से क्या हानि होती है?
अत्यंत धीरे-धीरे खाने से तृप्ति नहीं मिलती, अधिक खाया हुआ भोजन ठंडा हो जाता है और वह विषम रूप से पचता है।
11Aharavicharah mein baat karte hue khana kyon mana hai?
पाठ के अनुसार, बात करते, हँसते या अन्यमनस्क होकर भोजन करने वाले को वही दोष होते हैं जो अत्यंत शीघ्र भोजन करने से होते हैं।
12इस पाठ में 'बुभुक्षा' शब्द का क्या अर्थ है?
पाठ के शब्दार्थ खंड के अनुसार 'बुभुक्षा' का अर्थ है — भोजन की इच्छा ('भोक्तुम् इच्छा')।
13क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?
हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।
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