Chapter 9 — Arey In Dohun Raah Na Paayi, Balam Aavo Hamare Geh Re
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Chapter 9 of the Class 11 Hindi NCERT textbook (Antra), 'Arey In Dohun Raah Na Paayi' (अरे इन दोहुन राह न पाई), कबीर के दो पदों पर आधारित पाठ है — पहले पद में हिंदू और मुसलमान दोनों के बाह्याडंबरों की आलोचना है, और दूसरे पद में कबीर विरहिणी स्त्री के रूप में प्रियतम (ईश्वर) से मिलन की आकांक्षा व्यक्त करते हैं।
- बाह्याडंबर और धार्मिक पाखंड की आलोचना — पहले पद में कबीर 'हिंदुन की हिंदुवाई देखी तुरकन की तुरकाई' कहकर दोनों धर्मों के खोखले आचरण और कुरीतियों पर सीधा प्रश्न उठाते हैं। यह निर्गुण ज्ञानमार्गी दृष्टि बाह्य कर्मकांड के बजाय भीतरी सच्चाई पर बल देती है।
- विरह और दाम्पत्य-भक्ति — दूसरे पद 'बालम, आवो हमारे गेह रे' में कबीर स्वयं को विरहिणी स्त्री बनाकर प्रियतम से घर लौटने की आकांक्षा व्यक्त करते हैं। यहाँ दाम्पत्य प्रेम और घर की महत्ता के रूपक से ईश्वर-मिलन की तड़प प्रकट होती है।
- जनभाषा में दार्शनिक गहराई — कबीर की काव्यभाषा में जनभाषा की सहजता के साथ भावों की गहराई है। 'कामिन को है बालम प्यारा, ज्यों प्यासे को नीर रे' जैसी सरल तुलनाएँ गहरे दार्शनिक चिंतन को सहज रूप में व्यक्त करती हैं।
Key points & formulas
- 01कवि परिचय: कबीर (सन् 1398-1518) का जन्म काशी में हुआ था; वे स्वामी रामानंद के शिष्य थे; उन्होंने स्वयं को जुलाहा और काशी का निवासी कहा है; जीवन के अंतिम समय में मगहर चले गए और वहीं शरीर त्यागा।
- 02विधा: पद — कबीर ने मूलतः साखी, सबद और रमैनी रचे; रचनाएँ कबीर ग्रंथावली में संगृहीत हैं; कबीर पंथ में बीजक का विशेष महत्त्व है; कुछ रचनाएँ गुरुग्रंथ साहब में भी संकलित हैं।
- 03पहले पद का केंद्रीय भाव: 'अरे इन दोहुन राह न पाई' — हिंदू और मुसलमान दोनों के बाह्याडंबरों की कड़ी आलोचना; 'हिंदुन की हिंदुवाई देखी तुरकन की तुरकाई' — दोनों धर्मों के खोखले आचरण पर सीधा प्रश्न।
- 04दूसरे पद का केंद्रीय भाव: 'बालम, आवो हमारे गेह रे' — कबीर ने स्वयं को विरहिणी स्त्री के रूप में प्रस्तुत कर प्रियतम से घर लौटने की आकांक्षा व्यक्त की है; दाम्पत्य प्रेम और घर की महत्ता केंद्र में है।
- 05काव्य-सौंदर्य: कबीर की कविता की भाषा में 'जनभाषा की सहजता के साथ-साथ भावों की गहराई' है; उनकी काव्यभाषा में 'दार्शनिक चिंतन को सहज रूप में व्यक्त करने की शक्ति' है — 'कामिन को है बालम प्यारा, ज्यों प्यासे को नीर रे' जैसी पंक्तियाँ गहरे भाव को सरल तुलना से व्यक्त करती हैं।
- 06शब्दार्थ (1): गेह = घर; कामिन = प्रेमिका; पाइन-तर = पैरों पर, पैरों के पास।
- 07शब्दार्थ (2): पीर = गुरु, आध्यात्मिक शिक्षक, साधना में मार्गदर्शक; औलिया = संत, महात्मा, फ़क़ीर; खाला = मौसी, माँ की बहन; तुरकन = कबीर के समय में बाहर से हिंदुस्तान में आए लोग, खासतौर से मुसलमान शासक।
Frequently asked questions
01'अरे इन दोहुन राह न पाई' से कबीर का क्या आशय है?
कबीर कह रहे हैं कि इन दोनों — हिंदू और मुसलमान — को सच्चा मार्ग नहीं मिला है। दोनों बाह्याडंबरों में उलझे हैं और असली धर्म से दूर हैं; अंत में कबीर पूछते हैं: 'कौन राह ह्नै जाई'।
02कबीर का जन्म कहाँ हुआ था और उनके गुरु कौन थे?
कबीर का जन्म काशी में हुआ था। कहा जाता है कि वे स्वामी रामानंद के शिष्य थे। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम समय में मगहर में शरीर त्यागा।
03Kabir kis bhakti parampara ke kavi hain?
कबीर निर्गुण भक्त कवियों की ज्ञानमार्गी शाखा में सर्वोच्च स्थान रखते हैं। उनके काव्य में धर्म के बाह्याडंबरों का विरोध है और राम-रहीम की एकता की स्थापना का प्रयत्न भी।
04पहले पद में कबीर हिंदुओं और मुसलमानों की किन बातों पर प्रश्न उठाते हैं?
कबीर 'हिंदुन की हिंदुवाई' और 'तुरकन की तुरकाई' दोनों पर व्यंग्य करते हैं। वे बाह्य धार्मिक आचरण के आधार पर एक-दूसरे से श्रेष्ठता दिखाने के पाखंड को उजागर करते हैं।
05'बालम आवो हमारे गेह रे' में 'बालम' कौन है?
इस पद में कबीर ने स्वयं को विरहिणी स्त्री के रूप में प्रस्तुत करते हुए 'बालम' (प्रियतम) के रूप में ईश्वर को संबोधित किया है और उनसे 'गेह' (घर) लौटने की आकांक्षा व्यक्त की है।
06'अन्न न भावै नींद न आवै' का भाव क्या है?
यह दूसरे पद की पंक्ति है: 'अन्न न भावै नींद न आवै, गृह-बन धरै न धीर रे।' इसमें कबीर विरहिणी के रूप में बताते हैं कि प्रियतम के बिना न अन्न अच्छा लगता है, न नींद आती है, और न घर-वन में धैर्य ठहरता है — इस प्रकार तीव्र विरह की स्थिति व्यक्त होती है।
07'कामिन को है बालम प्यारा, ज्यों प्यासे को नीर रे' का आशय क्या है?
इस पंक्ति में कबीर कहते हैं कि जिस प्रकार प्यासे को पानी (नीर) सबसे प्रिय होता है, उसी प्रकार प्रेमिका (कामिन) को प्रियतम (बालम) प्यारा होता है — यह ईश्वर के प्रति आत्मा की गहरी तड़प को व्यक्त करता है।
08कबीर की प्रमुख रचनाएँ कौन-सी हैं और ये कहाँ संकलित हैं?
कबीर ने मूलतः साखी, सबद और रमैनी रचे। उनकी रचनाएँ मुख्यतः कबीर ग्रंथावली में संगृहीत हैं; कबीर पंथ में बीजक का विशेष महत्त्व है; और कुछ रचनाएँ गुरुग्रंथ साहब में भी संकलित हैं।
09दोनों पद किस पुस्तक से लिए गए हैं?
पाठ्यपुस्तक में दिए गए कबीर के दोनों पद पारसनाथ तिवारी द्वारा संपादित 'कबीर वाणी' से लिए गए हैं।
10कबीर ने विधिवत शिक्षा नहीं पाई थी तो उनके काव्य में ज्ञान कहाँ से आया?
स्रोत के अनुसार कबीर ने कहा: 'मसि कागद छुयो नहीं, कलम गही नहि हाथ।' किंतु वे प्रारंभ से ही संतों और फ़क़ीरों की संगति में रहे, जिससे उनके पास उच्चकोटि के ज्ञान के साथ-साथ मौलिक चिंतन की विलक्षण प्रतिभा थी।
11'गेह', 'कामिन' और 'पीर' शब्दों के अर्थ क्या हैं?
पाठ के शब्दार्थ के अनुसार — 'गेह' = घर; 'कामिन' = प्रेमिका; 'पीर' = गुरु, आध्यात्मिक शिक्षक, साधना में मार्गदर्शक, अल्लाह का पैगंबर।
12क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?
हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।
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