Summary
Chapter 13 of the Class 7 Sanskrit NCERT textbook (Deepakam), 'Varnamatra-Parichayah' (वर्णमात्रा-परिचयः), एक व्याकरण-पाठ है जो संवाद-शैली में स्वरों की तीन मात्राओं (ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत) और व्यंजनों की अर्धमात्रा — अर्थात् ध्वनि की अवधि — का परिचय देता है।
- मात्रा की अवधारणा — संस्कृत में स्वरों की तीन मात्राएँ होती हैं — एकमात्र (ह्रस्व: अ, इ, उ), द्विमात्र (दीर्घ: आ, ई, ऊ) और त्रिमात्र (प्लुत: अ३, ओ३म्)। व्यंजनों की सदा अर्धमात्रा होती है; कुल २२ स्वर माने गए हैं।
- प्लुत स्वर और ध्वनि-उदाहरण — प्लुत स्वर दूर से पुकारने (हे३ राम!) और वैदिक मंत्रों के आरंभ (ओ३म्) में आता है। पाणिनीय-शिक्षा पशु-पक्षियों की ध्वनि से मात्रा समझाती है — नीलकण्ठ एकमात्र, कौआ द्विमात्र, मोर त्रिमात्र, नेवला अर्धमात्र।
- मात्रा-गणना का अभ्यास — याज्ञवल्क्य-शिक्षा का श्लोक मात्राओं का मूल नियम देता है। प्रत्येक वर्ण की मात्रा जोड़कर शब्द की कुल मात्रा निकाली जाती है — जैसे रामः = ४½, सीता = ५, हनूमान् = ७ मात्राएँ।
Key points & formulas
- 01व्याकरण-विषय: संस्कृत में वर्णों की चार प्रकार की मात्राएँ होती हैं — स्वरों की तीन (ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत) और व्यंजनों की एक (अर्धमात्रा)।
- 02स्वरों के तीन उपभेद: एकमात्र = ह्रस्व (अ, इ, उ आदि); द्विमात्र = दीर्घ (आ, ई, ऊ आदि); त्रिमात्र = प्लुत (अ३, इ३, ओ३म् आदि)। संस्कृत में कुल २२ स्वर होते हैं।
- 03प्लुत स्वर का प्रयोग दो संदर्भों में होता है — (क) दूर से किसी को पुकारने पर, जैसे 'हे३ राम!' और 'कुमार३'; (ख) वैदिक मंत्रों के प्रारंभ में, जैसे 'ओ३म्'।
- 04याज्ञवल्क्य-शिक्षा का श्लोक: "एकमात्रो भवेद् ह्रस्वः द्विमात्रो दीर्घ उच्यते। त्रिमात्रश्च प्लुतो ज्ञेयः व्यञ्जनं चार्धमात्रिकम्॥" — यह मात्राओं का मूल नियम है।
- 05पाणिनीय-शिक्षा के श्लोक में पशु-पक्षियों की ध्वनि से उदाहरण: चाषः (नीलकण्ठ) = एकमात्र, वायसः (कौआ) = द्विमात्र, शिखी (मोर) = त्रिमात्र, नकुलः (नेवला) = अर्धमात्र।
- 06मात्रा-गणना: प्रत्येक वर्ण की मात्रा जोड़कर शब्द की कुल मात्राएँ निकाली जाती हैं — जैसे रामः = ४½ मात्राएँ, सीता = ५ मात्राएँ, हनूमान् = ७ मात्राएँ।
- 07कठिन शब्द: कुक्कुटः = मुर्गा; चाषः = नीलकण्ठ पक्षी; नकुलः = नेवला; अल्पकालिकः = स्वल्प समय वाला; लम्बकालिकः = लम्बे समय वाला।
Frequently asked questions
01varnamatra-parichayah paath mein kya sikhaya gaya hai?
इस पाठ में संस्कृत वर्णों की मात्राओं का परिचय दिया गया है। स्वरों की तीन मात्राएँ (ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत) और व्यंजनों की एक अर्धमात्रा होती है — यही इस पाठ का मुख्य विषय है।
02ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत में क्या अंतर है?
ह्रस्व = एकमात्रा (सबसे कम समय), दीर्घ = द्विमात्रा (दोगुना समय), प्लुत = त्रिमात्रा (तिगुना समय)। उदाहरण: 'उ' ह्रस्व है, 'ऊ' दीर्घ है, और 'उ३' प्लुत है।
03प्लुत स्वर का प्रयोग कहाँ होता है?
प्लुत स्वर का प्रयोग दो प्रमुख स्थानों पर होता है — (क) दूर से किसी को पुकारते समय, जैसे 'हे३ राम!' या 'कुमार३'; (ख) वेद-मंत्रों के प्रारंभ में ओंकार के उच्चारण में, जैसे 'ओ३म्'।
04संस्कृत में कुल कितने स्वर होते हैं?
संस्कृत में आहत्य २२ स्वर होते हैं — समानाक्षर और सन्ध्यक्षर की तीनों मात्राओं (ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत) को मिलाकर।
05व्यंजनों की कितनी मात्राएँ होती हैं?
सभी व्यंजनों की नित्य अर्धमात्रा (½) होती है। स्वरों की भाँति व्यंजनों में ह्रस्व, दीर्घ, या प्लुत भेद नहीं होता।
06याज्ञवल्क्य-शिक्षा का श्लोक कौन-सा है?
याज्ञवल्क्य-शिक्षा का प्रसिद्ध श्लोक है: 'एकमात्रो भवेद् ह्रस्वः द्विमात्रो दीर्घ उच्यते। त्रिमात्रश्च प्लुतो ज्ञेयः व्यञ्जनं चार्धमात्रिकम्॥' — इसमें चारों मात्राओं का नियम एक साथ दिया गया है।
07पाणिनीय-शिक्षा में किन पशु-पक्षियों का उदाहरण दिया गया है?
पाणिनीय-शिक्षा के श्लोक में चार उदाहरण हैं: चाषः (नीलकण्ठ पक्षी) = एकमात्र ध्वनि (ह्रस्व), वायसः (कौआ) = द्विमात्र ध्वनि (दीर्घ), शिखी (मोर) = त्रिमात्र ध्वनि (प्लुत), नकुलः (नेवला) = अर्धमात्र ध्वनि (व्यंजन जैसी)।
08रामः शब्द की मात्रा-गणना कैसे होती है?
रामः = र् + आ + म् + अ + ः = ½ + २ + ½ + १ + ½ = ४½ मात्राएँ। प्रत्येक व्यंजन को ½ और स्वर को उसकी मात्रा के अनुसार गिना जाता है।
09ओ३म् में कितनी मात्राएँ हैं?
ओ३म् = ओ३ + म् = ३ + ½ = ३½ मात्राएँ। यहाँ 'ओ' प्लुत स्वर (त्रिमात्र) है और 'म्' व्यंजन (अर्धमात्र) है।
10अवग्रह (ऽ) चिह्न का क्या प्रयोग है?
अवग्रह (ऽ) कोई नया वर्ण नहीं है, इसका अपना कोई उच्चारण नहीं होता। संधि-नियम के अनुसार जब 'अ' अदृश्य हो जाता है, तब इस चिह्न का प्रयोग होता है। जैसे 'कः अपि' → 'कोऽपि'। 'कोपि' और 'कोऽपि' दोनों का उच्चारण एक-सा है।
11मात्राओं का महत्त्व क्या है?
मात्रा-गणना का उपयोग वर्णों और शब्दों के सम्यक् उच्चारण में तथा श्लोक-रचना (छन्द) में होता है। संस्कृत में निर्दिष्ट मात्राओं वाले छन्दोबद्ध श्लोक और स्तोत्र विश्वभर में विख्यात हैं।
12कुक्कुट (मुर्गे) की ध्वनि से मात्राओं का उदाहरण कैसे समझाया गया है?
अध्यापक ने बताया कि मुर्गे की बाँग में तीन प्रकार की ध्वनियाँ होती हैं — 'उ' (अल्पकालिक = ह्रस्व), 'ऊ' (लम्बकालिक = दीर्घ), 'उ३' (अतिविलम्बकालिक = प्लुत)। इससे तीनों मात्राओं का व्यावहारिक बोध होता है।
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