Summary
Chapter 1 of the Class 12 Sanskrit NCERT textbook (Shaswati), 'Vidyayamritamashnute' (विद्यया अमृतमश्नुते), ईशावास्योपनिषत् से संकलित है, जो यजुर्वेद की माध्यन्दिन एवं काण्व संहिता का 40वाँ अध्याय है। इस पाठ में विद्या (आध्यात्मिक ज्ञान) और अविद्या (व्यावहारिक ज्ञान) के समन्वय से अमृतत्व-प्राप्ति का संदेश दिया गया है।
- विद्या-अविद्या का समन्वय — पाठ का मूल दर्शन यह है कि लौकिक अविद्या और आध्यात्मिक विद्या एक-दूसरे की पूरक हैं। केवल एक में रत रहने वाला अन्धकार में जाता है; दोनों को जानने वाला ही अविद्या से मृत्यु पार कर विद्या से अमृतत्व प्राप्त करता है।
- ईश्वर की सर्वव्यापकता और त्यागभाव — प्रथम मन्त्र समस्त जगत् को ईश्वर से व्याप्त बताकर त्यागपूर्वक भोग का निर्देश देता है और किसी के धन के लोभ का निषेध करता है — भोग और वैराग्य के बीच संतुलन ही जीवन-मार्ग है।
- आत्मतत्त्व एवं कर्मशील जीवन — मन्त्रों में सर्वव्यापक, स्थिर किन्तु वेगवान आत्मतत्त्व का निरूपण है और कर्म करते हुए जीने की प्रेरणा दी गई है। आत्मा की व्यापकता न मानने वालों को अज्ञान में डूबा हुआ बताया गया है।
Key points & formulas
- 01स्रोत एवं विधा: यह पाठ ईशावास्योपनिषत् से संकलित है, जो यजुर्वेद की माध्यन्दिन एवं काण्व संहिता का 40वाँ अध्याय है; इस उपनिषत् में कुल 18 मन्त्र हैं।
- 02केंद्रीय भाव: लौकिक विद्या (अविद्या) और आध्यात्मिक विद्या दोनों एक-दूसरे की पूरक हैं; मानव-जीवन की परिपूर्णता एवं सर्वाङ्गीण विकास के लिए दोनों समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
- 03प्रमुख श्लोक 1 (मन्त्र 1): 'ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥' — भावार्थ: यह समस्त जगत् ईश्वर से व्याप्त है; त्यागपूर्वक भोग करो और किसी के धन का लोभ मत करो।
- 04प्रमुख श्लोक 2 (मन्त्र 7): 'विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं स ह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥' — भावार्थ: जो विद्या और अविद्या दोनों को जानता है, वह अविद्या से मृत्यु पार कर विद्या से अमृतत्व प्राप्त करता है।
- 05मुख्य शिक्षा: जो केवल अविद्या (व्यावहारिक ज्ञान) में रत हैं वे अन्धकार में जाते हैं, और जो केवल विद्या (आध्यात्मिक ज्ञान) में रत हैं वे और भी अधिक अन्धकार में — इसीलिए दोनों का समन्वय आवश्यक है।
- 06कठिन शब्दार्थ 1: 'ईशावास्यम्' = ईश्वर से व्याप्त; 'मा गृधः' = लोलुप मत हो, लोभ मत करो; 'अनेजत्' = कम्पन रहित, विकार रहित, स्थिर।
- 07कठिन शब्दार्थ 2: 'अमृतम्' = जन्म-मृत्यु के दुःख से रहित अमरत्व; 'आत्महनः' = आत्मा की व्यापकता को जो स्वीकार नहीं करते; 'जवीयः' = अतिशय वेगवाला।
Frequently asked questions
01विद्ययाऽमृतमश्नुते पाठ किस ग्रन्थ से लिया गया है?
यह पाठ ईशावास्योपनिषत् से संकलित है, जो यजुर्वेद की माध्यन्दिन एवं काण्व संहिता का 40वाँ अध्याय है और जिसमें कुल 18 मन्त्र हैं।
02Vidyayamritamashnute path ka kendra bhav kya hai?
इस पाठ का केंद्रीय भाव है कि लौकिक विद्या (अविद्या) और आध्यात्मिक विद्या दोनों एक-दूसरे की पूरक हैं तथा मानव-जीवन की परिपूर्णता एवं सर्वाङ्गीण विकास के लिए दोनों आवश्यक हैं।
03इस पाठ में 'विद्या' और 'अविद्या' का क्या अर्थ है?
पाठ के शब्दार्थ के अनुसार 'विद्या' का अर्थ है अध्यात्म ज्ञान — आत्मस्वरूप ईश्वर का ज्ञान (मोक्ष विद्या); 'अविद्या' का अर्थ है व्यावहारिक ज्ञान — भौतिक विज्ञान, यज्ञविद्या, आयुर्विज्ञान, प्रौद्योगिकी आदि।
04ईशावास्योपनिषत् में कितने मन्त्र हैं?
ईशावास्योपनिषत् में कुल 18 मन्त्र हैं। इस पाठ में उनमें से सात मन्त्र संकलित किए गए हैं।
05Ishavasyopanishad kis veda ka hissa hai?
ईशावास्योपनिषत् यजुर्वेद की माध्यन्दिन एवं काण्व संहिता का 40वाँ अध्याय है।
06इस पाठ में 'आत्महनः' किसे कहा गया है?
पाठ के अनुसार 'आत्महनः' वे लोग हैं जो आत्मा की व्यापकता को स्वीकार नहीं करते। तृतीय मन्त्र में कहा गया है कि ऐसे लोग मरण के पश्चात् अन्धेन तमसा आवृत लोकों को प्राप्त होते हैं।
07पाठ का शीर्षक 'विद्ययाऽमृतमश्नुते' का अर्थ क्या है?
यह शीर्षक पाठ के सातवें मन्त्र की अन्तिम पंक्ति से लिया गया है। 'अमृतम्' का अर्थ है जन्म-मृत्यु के दुःख से रहित अमरत्व, और 'अश्नुते' का अर्थ है प्राप्त करना — अर्थात् विद्या से अमृतत्व प्राप्त होता है।
08चतुर्थ मन्त्र में आत्मतत्त्व का क्या वर्णन है?
चतुर्थ मन्त्र में आत्मतत्त्व को 'अनेजत्' (कम्पन रहित, स्थिर), 'एकं' (एक), और 'मनसो जवीयः' (मन से भी अधिक वेगवाला) बताया गया है। यह चैतन्य स्वरूप, स्वयं प्रकाश एवं विभु सर्वव्यापक है।
09Paanchwein aur chhathe mantra mein kya sandesh hai?
पंचम मन्त्र में कहा गया है कि जो केवल अविद्या की उपासना करते हैं वे घने अन्धकार में प्रवेश करते हैं; और जो केवल विद्या में रत हैं वे उससे भी अधिक अन्धकार में जाते हैं। षष्ठ मन्त्र में धीरों ने उपदेश दिया है कि विद्या और अविद्या के फल अलग-अलग हैं।
10प्रथम मन्त्र में किस प्रकार का भोग करने का निर्देश है?
'तेन त्यक्तेन भुंजीथाः' — प्रथम मन्त्र में त्यागपूर्वक संसार के पदार्थों का उपयोग एवं संरक्षण करने का निर्देश है; साथ ही 'मा गृधः' — लोलुप न होने की शिक्षा दी गई है।
11इस पाठ का मनुष्य-जीवन के लिए क्या सन्देश है?
पाठ का सन्देश है कि लौकिक एवं अध्यात्म विद्या एक-दूसरे की पूरक हैं और मानव-जीवन की परिपूर्णता एवं सर्वाङ्गीण विकास में दोनों समान रूप से महत्त्व रखती हैं।
12क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?
हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।
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