SanskritClass 12

Shaswati

Sanskrit Textbook11 Chapters

Chapter notes

What you'll learn in Shaswati

A quick revision map of Shaswati — the core idea and five key takeaways from each chapter. Tap any chapter to read the full NCERT PDF and detailed notes.

01

Vidyayamritamashnute

Chapter 1 of the Class 12 Sanskrit NCERT textbook (Shaswati), 'Vidyayamritamashnute' (विद्यया अमृतमश्नुते), ईशावास्योपनिषत् से संकलित है, जो यजुर्वेद की माध्यन्दिन एवं काण्व संहिता का 40वाँ अध्याय है। इस पाठ में विद्या (आध्यात्मिक ज्ञान) और अविद्या (व्यावहारिक ज्ञान) के समन्वय से अमृतत्व-प्राप्ति का संदेश दिया गया है।

  • 1स्रोत एवं विधा: यह पाठ ईशावास्योपनिषत् से संकलित है, जो यजुर्वेद की माध्यन्दिन एवं काण्व संहिता का 40वाँ अध्याय है; इस उपनिषत् में कुल 18 मन्त्र हैं।
  • 2केंद्रीय भाव: लौकिक विद्या (अविद्या) और आध्यात्मिक विद्या दोनों एक-दूसरे की पूरक हैं; मानव-जीवन की परिपूर्णता एवं सर्वाङ्गीण विकास के लिए दोनों समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
  • 3प्रमुख श्लोक 1 (मन्त्र 1): 'ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥' — भावार्थ: यह समस्त जगत् ईश्वर से व्याप्त है; त्यागपूर्वक भोग करो और किसी के धन का लोभ मत करो।
  • 4प्रमुख श्लोक 2 (मन्त्र 7): 'विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं स ह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥' — भावार्थ: जो विद्या और अविद्या दोनों को जानता है, वह अविद्या से मृत्यु पार कर विद्या से अमृतत्व प्राप्त करता है।
  • 5मुख्य शिक्षा: जो केवल अविद्या (व्यावहारिक ज्ञान) में रत हैं वे अन्धकार में जाते हैं, और जो केवल विद्या (आध्यात्मिक ज्ञान) में रत हैं वे और भी अधिक अन्धकार में — इसीलिए दोनों का समन्वय आवश्यक है।
02

Raghukauttasa Samvadah

Chapter 2 of the Class 12 Sanskrit NCERT textbook (Shaswati), 'Raghukauttasa Samvadah' (रघुकौत्ससंवादः), महाकवि कालिदास-रचित 'रघुवंश' महाकाव्य के पंचम सर्ग से संकलित पाठ है, जिसमें साकेत नगरी में महाराज रघु और ऋषि वरतन्तु के शिष्य कौत्स के बीच हुए संवाद का वर्णन है।

  • 1पाठ का स्रोत एवं विधा: महाकवि कालिदास-रचित 'रघुवंश' महाकाव्य का पंचम सर्ग; यह संस्कृत महाकाव्य की शैली में रचित संवाद-काव्यांश है।
  • 2मुख्य पात्र: ब्रह्मचारी कौत्स (ऋषि वरतन्तु के शिष्य), महाराज रघु (साकेत के राजा), और कुबेर (धनपति)।
  • 3कौत्स ने वेद, पुराण, वेदाङ्ग, दर्शन सहित 14 विद्याओं का अध्ययन पूर्ण किया और गुरुदक्षिणा में 14 करोड़ स्वर्णमुद्राएँ देने की आज्ञा पाई।
  • 4केंद्रीय शिक्षा: शासक को सर्वसाधारण जन के प्रति उदार एवं कल्याणकारी होना चाहिए और याचक को आवश्यकता से अधिक प्राप्त करने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए।
  • 5प्रमुख श्लोक (श्लोक 1, वरतन्तुशिष्यः): 'तमध्वरे विश्वजिति क्षितीशं निःशेषविश्राणितकोषजातम् । उपात्तविद्यो गुरुदक्षिणार्थी कौत्सः प्रपेदे वरतन्तुशिष्यः ॥' — भावार्थ: विश्वजित् यज्ञ में सम्पूर्ण धन दान कर चुके राजा के पास, विद्या प्राप्त कर गुरुदक्षिणा की इच्छा से वरतन्तु के शिष्य कौत्स पहुँचे।
03

Balakautukam

Chapter 3 of the Class 12 Sanskrit NCERT textbook (Shaswati), 'Balakautukam' (बालकौतुकम्), महाकवि भवभूति द्वारा रचित प्रसिद्ध नाटक 'उत्तररामचरितम्' के चतुर्थ अंक से संकलित नाट्यांश है। इस पाठ में महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में बालक लव के वात्सल्यमय परिचय और अश्वमेधीय अश्व को बाँधने के साहसिक प्रसंग का मार्मिक चित्रण है।

  • 1स्रोत एवं विधा: यह पाठ महाकवि भवभूति के संस्कृत नाटक 'उत्तररामचरितम्' के चतुर्थ अंक से संकलित नाट्यांश है। भवभूति आठवीं शताब्दी में कान्यकुब्जेश्वर यशोवर्मण के समकालीन महाकवि थे जिन्होंने तीन नाटक रचे — मालतीमाधवम्, महावीरचरितम् और उत्तररामचरितम्।
  • 2केन्द्रीय भाव: पाठ का शीर्षक 'बालकौतुकम्' ही इसका मूल विषय बताता है — बालक लव का बालसुलभ कौतूहल (घोड़ा देखने की उत्सुकता) और उनकी सहज क्षत्रिय-वीरता (अश्वमेधीय अश्व को बाँधने का आदेश, रक्षकों की धमकी पर धनुष चढ़ाना)।
  • 3मुख्य पात्र एवं घटनाएँ: राजर्षि जनक, कौसल्या और अरुन्धती का लव में राम-सीता की झलक देखकर वात्सल्य-वर्षा; बटवों द्वारा अश्व का बालोचित वर्णन; लव का अश्वमेधीय अश्व पहचानना; रक्षकों की धमकी पर लव द्वारा धनुष चढ़ाना।
  • 4प्रमुख श्लोक (कौसल्या, लव को देखकर): 'कुवलयदलस्निग्धश्यामः शिखण्डकमण्डनो वटुपरिषदं पुण्यश्रीकः श्रियैव सभाजयन् । पुनरपि शिशुर्भूतो वत्सः स मे रघुनन्दनो झटिति कुरुते दृष्टः कोऽयं दृशोरमृतांजनम् ॥' — भावार्थ: नील-कमल-दल के समान श्यामवर्ण, काकपक्ष-मण्डित यह अलौकिक बालक देखते ही आँखों में अमृत-अंजन जैसी शीतलता भर देता है; लगता है रघुनन्दन राम ही फिर से बालक बन गए हों।
  • 5प्रमुख श्लोक (बटव, अश्व का वर्णन): 'पश्चात्पुच्छं वहति विपुलं तच्च धूनोत्यजड्डम् दीर्घग्रीवः स भवति, खुरास्तस्य चत्वार एव । शष्पाण्यत्ति, प्रकिरति शकृत्पिण्डकानाम्रमात्रन् किं व्याख्यानैर्व्रजति स पुनर्दूरमेह्येहि यामः ॥' — भावार्थ: वह पीछे विशाल पूँछ निरन्तर हिलाता है, लम्बी गर्दन और चार खुर हैं, घास खाता तथा आम-फल-जैसे गोबर के ढेर बिखेरता है — बातों में क्या रखा, चलो खुद देखते हैं।
04

Karmagauravam

Chapter 4 of the Class 12 Sanskrit NCERT textbook (Shaswati), 'Karmagauravam' (कर्मगौरवम्), श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय एवं तृतीय अध्यायों से संगृहीत है, जिसमें श्रीकृष्ण ने विषादग्रस्त अर्जुन को निःसंगभाव से नियत कर्म करने का उपदेश दिया है।

  • 1स्रोत: यह पाठ श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय एवं तृतीय अध्यायों से संगृहीत है; श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्मपर्व में विद्यमान है और इसमें सात सौ श्लोक एवं अठारह अध्याय हैं।
  • 2केंद्रीय भाव: निःसंगभाव से नियत कर्म करते रहो, फल में कभी आसक्ति न रखो; कर्मों में कुशलता को ही योग कहा गया है।
  • 3मुख्य पात्र: श्रीकृष्ण (उपदेशक) और विषादग्रस्त अर्जुन (शिष्य); जनकादि राजा उदाहरण के रूप में उद्धृत हैं जिन्होंने कर्म से ही संसिद्धि प्राप्त की।
  • 4प्रमुख श्लोक: 'नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः' — भावार्थ: नियत कर्म करते रहो, कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है।
  • 5प्रमुख श्लोक: 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सघ्गोऽस्त्वकर्मणि॥' — भावार्थ: कर्म में ही तुम्हारा अधिकार है, फल में कभी नहीं; कर्मफल की कामना मत करो और अकर्म में आसक्ति भी मत रखो।
05

Shukanasopadeshaha

Chapter 5 of the Class 12 Sanskrit NCERT textbook (Shaswati), 'Shukanasopadeshaha' (शुकनासोपदेशः), महाकवि बाणभट्ट के गद्यकाव्य 'कादम्बरी' के 'शुकनासोपदेशः' गद्यांश पर आधारित है, जिसमें अनुभवी मन्त्री शुकनास राजकुमार चन्द्रापीड को राज्याभिषेक से पूर्व यौवन, ऐश्वर्य और लक्ष्मी से उत्पन्न दोषों के प्रति वात्सल्यभाव से सावधान करते हैं।

  • 1पाठ का स्रोत एवं विधा: यह पाठ महाकवि बाणभट्ट (राजा हर्षवर्धन के समकालीन, 606–648 ई.) के संस्कृत गद्यकाव्य 'कादम्बरी' से लिया गया है; 'कादम्बरी' संस्कृत साहित्य का सर्वोत्कृष्ट गद्यकाव्य है और 'कथा' श्रेणी का काव्य है।
  • 2केंद्रीय भाव: अनुभवी मन्त्री शुकनास राजकुमार चन्द्रापीड को राज्याभिषेक से पूर्व चार महान अनर्थों — गर्भेश्वरत्वम्, अभिनवयौवनत्वम्, अप्रतिमरूपत्वम् और अमानुषशक्तित्वम् — के प्रति सावधान करते हैं। इसे समस्त युवकों को प्रदत्त 'दीक्षान्त भाषण' कहा जा सकता है।
  • 3गुरुपदेश की महिमा: पाठ में कहा गया है — 'गुरूपदेशः नाम अखिलमलप्रक्षालनक्षमम् अजलं स्नानम्' अर्थात् गुरु का उपदेश जल-रहित स्नान के समान है जो समस्त मल को धो देने में सक्षम है।
  • 4लक्ष्मी की अनार्यता: पाठ में लक्ष्मी को 'अनार्या' कहा गया है — वह न परिचय रक्षति, न अभिजन देखती है, न गुणवान को स्पर्श करती है, दाता को दुःस्वप्न की तरह भूल जाती है और राजाओं को सर्वाविनय का अड्डा बना देती है।
  • 5धूर्त-चापलूसों से सतर्कता: शुकनास चेतावनी देते हैं कि स्वार्थनिष्पादन-परायण धूर्त लोग राजाओं के दोषों को भी गुण के रूप में प्रस्तुत कर उन्हें भटका देते हैं और वे लोगों के उपहास के पात्र बन जाते हैं।
06

Suktisudhaa

Chapter 6 of the Class 12 Sanskrit NCERT textbook (Shaswati), 'Suktisudhaa' (सूक्तिसुधा), पाँच प्रसिद्ध संस्कृत कवियों — पण्डितराज जगन्नाथ, महाकवि माघ, भवभूति, भारवि और भर्तृहरि — की बारह सूक्तियों का संकलन है, जो जीवन में विवेक, सच्ची मित्रता, सद्वाणी और समय के सदुपयोग जैसे विषयों पर प्रकाश डालती हैं।

  • 1स्रोत एवं विधा: यह पाठ पाँच संस्कृत कवियों की सूक्तियों का संकलन है — पण्डितराज जगन्नाथ (श्लोक 1-3), महाकवि माघ (4), भवभूति (5), भारवि (6) और भर्तृहरि (7-12)।
  • 2केंद्रीय भाव: 'सूक्तिसुधा' का अर्थ है 'सुन्दर वचन रूपी अमृत'; ये सूक्तियाँ विभिन्न विषयों से सम्बद्ध हैं और जीवन में सद्मार्ग दिखाती हैं।
  • 3भारवि-रचित श्लोक 6 (विवेक का महत्त्व): 'सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्। वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥' — भावार्थ: बिना विचारे कार्य नहीं करना चाहिए; सम्पदाएँ स्वयं सोच-समझकर कार्य करने वाले का वरण करती हैं।
  • 4भर्तृहरि-रचित श्लोक 8 (महात्माओं के गुण): 'विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः। यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्॥' — भावार्थ: विपत्ति में धैर्य, उन्नति में क्षमा, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में पराक्रम और यश की अभिरुचि महात्माओं के प्रकृतिसिद्ध गुण हैं।
  • 5सन्मित्र के लक्षण (श्लोक 9, भर्तृहरि): पाप से रोकना, हित में प्रवृत्त करना, रहस्य छिपाना, गुणों को प्रकट करना, विपत्ति में साथ न छोड़ना और समय पर सहायता देना — ये सन्तों द्वारा प्रतिपादित सन्मित्र के लक्षण हैं।
07

Vikramasyaudaryam

Chapter 7 of the Class 12 Sanskrit NCERT textbook (Shaswati), 'Vikramasyaudaryam' (विक्रमस्यौदार्यम्), 'सिंहासनद्वात्रिंशिका' ग्रंथ से उद्धृत है, जिसमें राजा विक्रमादित्य की अपार उदारता (औदार्य) का वर्णन है — उन्होंने 'सर्वस्वदक्षिणयज्ञ' में सम्पूर्ण राजकोष और समुद्र से प्राप्त चार दिव्य रत्न भी एक ब्राह्मण को दान कर दिए।

  • 1पाठ का स्रोत एवं विधा: 'सिंहासनद्वात्रिंशिका' — राजा भोज को सुनाई गई 32 मनोरंजक कथाओं का संग्रह; इस ग्रंथ में गद्यमय, पद्यमय और गद्य-पद्यमय तीन प्रकार के पाठ हैं। ग्रंथ का समय राजा भोज (1018–1063) के पश्चात् माना जाता है। प्रस्तुत पाठ गद्य-पद्यमय विधा का है।
  • 2केंद्रीय भाव: राजा विक्रमादित्य का 'औदार्य' (उदारता); उन्हें संसार असार प्रतीत हुआ और उन्होंने 'सर्वस्वदक्षिणयज्ञ' के माध्यम से सम्पूर्ण राजकोष दान किया।
  • 3मुख्य पात्र एवं घटनाएँ: विक्रमादित्य, राजा भोज, सिंहासन की पुत्तलिका, ब्राह्मण दूत और समुद्र (ब्राह्मण रूप धारण करके)। यज्ञ के लिए देव, मुनि, गंधर्व, यक्ष, सिद्धादि सभी को आमंत्रित किया गया।
  • 4समुद्र के चार रत्न: प्रथम से इच्छित वस्तु मिलती है, द्वितीय से अमृत-तुल्य भोजन उत्पन्न होता है, तृतीय से चतुरङ्गबल (घुड़सवार, रथसवार, हाथीसवार और पैदल सैनिकों की सेना) मिलती है, चतुर्थ से दिव्य आभूषण प्राप्त होते हैं।
  • 5प्रमुख श्लोक (verbatim): 'उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम् । तटाकोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम् ॥' — भावार्थ: कमाए हुए धन की रक्षा उसके त्याग (दान) में है, जैसे तालाब की गहराई में स्थित जल की रक्षा उसके निकास (परीवाह) से होती है।

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