Summary
Chapter 6 of the Class 12 Sanskrit NCERT textbook (Shaswati), 'Suktisudhaa' (सूक्तिसुधा), पाँच प्रसिद्ध संस्कृत कवियों — पण्डितराज जगन्नाथ, महाकवि माघ, भवभूति, भारवि और भर्तृहरि — की बारह सूक्तियों का संकलन है, जो जीवन में विवेक, सच्ची मित्रता, सद्वाणी और समय के सदुपयोग जैसे विषयों पर प्रकाश डालती हैं।
- सूक्ति-संकलन का स्वरूप — 'सूक्तिसुधा' अर्थात् 'सुन्दर वचन रूपी अमृत' — यह पाँच महाकवियों की बारह सूक्तियों का संग्रह है। श्लोक क्रमशः जगन्नाथ (1-3), माघ (4), भवभूति (5), भारवि (6) और भर्तृहरि (7-12) के हैं, जो विविध जीवन-मूल्यों का दिग्दर्शन कराते हैं।
- विवेक और महात्माओं के गुण — बिना विचारे किया कार्य विपत्ति का मूल है; सम्पदाएँ विचारशील का ही वरण करती हैं। महात्माओं के प्रकृतिसिद्ध गुण — विपत्ति में धैर्य, उन्नति में क्षमा, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में पराक्रम — जीवन के आदर्श हैं।
- सन्मित्र, सद्वाणी और समय का सदुपयोग — सन्मित्र पाप से रोकता, विपत्ति में साथ देता है; संस्कृत सद्वाणी ही स्थायी भूषण है जबकि अन्य आभूषण नष्ट हो जाते हैं। शरीर स्वस्थ रहते ही आत्मकल्याण का यत्न करना चाहिए — घर जलने पर कुआँ खोदना व्यर्थ है।
Key points & formulas
- 01स्रोत एवं विधा: यह पाठ पाँच संस्कृत कवियों की सूक्तियों का संकलन है — पण्डितराज जगन्नाथ (श्लोक 1-3), महाकवि माघ (4), भवभूति (5), भारवि (6) और भर्तृहरि (7-12)।
- 02केंद्रीय भाव: 'सूक्तिसुधा' का अर्थ है 'सुन्दर वचन रूपी अमृत'; ये सूक्तियाँ विभिन्न विषयों से सम्बद्ध हैं और जीवन में सद्मार्ग दिखाती हैं।
- 03भारवि-रचित श्लोक 6 (विवेक का महत्त्व): 'सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्। वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥' — भावार्थ: बिना विचारे कार्य नहीं करना चाहिए; सम्पदाएँ स्वयं सोच-समझकर कार्य करने वाले का वरण करती हैं।
- 04भर्तृहरि-रचित श्लोक 8 (महात्माओं के गुण): 'विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः। यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्॥' — भावार्थ: विपत्ति में धैर्य, उन्नति में क्षमा, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में पराक्रम और यश की अभिरुचि महात्माओं के प्रकृतिसिद्ध गुण हैं।
- 05सन्मित्र के लक्षण (श्लोक 9, भर्तृहरि): पाप से रोकना, हित में प्रवृत्त करना, रहस्य छिपाना, गुणों को प्रकट करना, विपत्ति में साथ न छोड़ना और समय पर सहायता देना — ये सन्तों द्वारा प्रतिपादित सन्मित्र के लक्षण हैं।
- 06सद्वाणी का महत्त्व (श्लोक 11, भर्तृहरि): 'क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्' — बाहुबन्ध, हार, स्नान, पुष्प आदि सब भूषण नष्ट हो जाते हैं किन्तु संस्कृत वाणी ही सच्चा और स्थायी भूषण है।
- 07समय के सदुपयोग का सन्देश (श्लोक 12, भर्तृहरि): जब तक शरीर स्वस्थ है, बुढ़ापा दूर है और इन्द्रियाँ सक्षम हैं — तभी विद्वान को आत्मकल्याण का महान प्रयत्न करना चाहिए; 'प्रोद्दीप्ते भवने च कूपखननं' — घर जलने पर कुआँ खोदना व्यर्थ है।
- 08कठिन शब्दार्थ (स्रोत से): 'मरालस्य' = हंस का; 'रसालः' = आम का वृक्ष; 'विमृश्यकारिणम्' = विचार करके कार्य करने वाले को; 'कलेवरगृहं' = शरीर; 'प्रोद्दीप्ते' = प्रज्वलित होने पर।
Frequently asked questions
01सूक्तिसुधा पाठ किस कक्षा और पुस्तक में है?
यह NCERT Class 12 Sanskrit की पाठ्यपुस्तक 'शाश्वती' का षष्ठ (छठा) पाठ है।
02Suktisudhaa mein kitne shlokas hain?
इस पाठ में 12 श्लोक हैं। श्लोक 1-3 पण्डितराज जगन्नाथ के, श्लोक 4 महाकवि माघ के, श्लोक 5 भवभूति के, श्लोक 6 भारवि के, और श्लोक 7-12 भर्तृहरि के हैं।
03'सूक्तिसुधा' नाम का क्या अर्थ है?
पाठ के अनुसार 'सूक्ति' का अर्थ है सुन्दर वचन और 'सुधा' का अर्थ है अमृत। अतः 'सूक्तिसुधा' का अर्थ है सुन्दर वचन रूपी अमृत।
04'सहसा विदधीत न क्रियाम्' — इस श्लोक का भावार्थ क्या है?
यह श्लोक 6 महाकवि भारवि का है। अर्थ है — बिना सोचे-विचारे कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए; अविवेक ही सबसे बड़ी विपत्ति का कारण है। सम्पदाएँ स्वयं विचारकर कार्य करने वाले का वरण करती हैं।
05महात्माओं के प्रकृतिसिद्ध गुण कौन से हैं — Suktisudhaa Class 12 Sanskrit?
भर्तृहरि के श्लोक 8 के अनुसार विपत्ति में धैर्य, उन्नति में क्षमा, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में पराक्रम, यश में अभिरुचि और विद्या में अनुराग — ये महात्माओं के प्रकृतिसिद्ध गुण हैं।
06सन्मित्र के क्या लक्षण बताए गए हैं?
भर्तृहरि के श्लोक 9 के अनुसार: पाप से रोकना, हित में लगाना, रहस्य छिपाना, गुण प्रकट करना, विपत्ति में साथ न छोड़ना और समय पर सहायता करना — ये सन्त लोग सन्मित्र के लक्षण बताते हैं।
07'वाग्भूषणं भूषणम्' का क्या तात्पर्य है?
भर्तृहरि के श्लोक 11 के अनुसार भुजबन्ध, हार, स्नान, पुष्प और केश-सज्जा आदि सब भूषण नष्ट हो जाते हैं, किन्तु संस्कृत वाणी ही सच्चा और स्थायी भूषण है।
08Suktisudhaa mein hanson ka udaharan kyun diya gaya hai?
पण्डितराज जगन्नाथ ने श्लोक 1 में बताया है कि जल सर्वत्र कमलों से शोभित होता है, फिर भी हंस का मन मानसरोवर के बिना नहीं रमता — यह उदाहरण स्वाभिमान और श्रेष्ठ स्थान की अभिलाषा को दर्शाता है।
09'प्रोद्दीप्ते भवने च कूपखननं' का क्या अर्थ है?
भर्तृहरि के श्लोक 12 में यह कहा गया है कि घर में आग लग जाने पर कुआँ खोदना व्यर्थ है; उसी प्रकार जब तक शरीर स्वस्थ है और बुढ़ापा दूर है, तभी आत्मकल्याण का प्रयत्न करना चाहिए।
10क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?
हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।
11'मौनमपण्डितानाम्' — इसका क्या अर्थ है?
भर्तृहरि के श्लोक 7 के अनुसार मौन अज्ञानता का आवरण है जिसे ब्रह्मा ने स्वयं निर्मित किया है; विशेषतः सर्वज्ञों की सभा में मौन रहना अपण्डितों का भूषण है।
12Suktisudhaa mein santjan ki kya visheshata batai gayi hai?
भर्तृहरि के श्लोक 10 के अनुसार सन्त लोग मन, वचन और शरीर से पुण्य से परिपूर्ण होते हैं, तीनों लोकों को उपकार से प्रसन्न करते हैं, दूसरों के अत्यन्त सूक्ष्म गुणों को भी बढ़ा-चढ़ाकर देखते हैं और अपने हृदय में सदा खिलते रहते हैं।
13NCERT शाश्वती कक्षा 12 संस्कृत के पाठ 6 का सारांश बताइए।
सूक्तिसुधा पाठ में पाँच संस्कृत कवियों की 12 सूक्तियाँ हैं जो आत्मसम्मान, विवेकपूर्ण आचरण, सच्ची मित्रता, सद्वाणी, महात्माओं के गुण और समय के सदुपयोग जैसे विषयों पर मार्गदर्शन देती हैं। पाठ के अनुसार ये सूक्तियाँ आज भी जीवन के लिए बहुमूल्य और पथप्रदर्शक हैं।
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