Class 12 Sanskrit

Chapter 4 — Karmagauravam

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Overview

Summary

Chapter 4 of the Class 12 Sanskrit NCERT textbook (Shaswati), 'Karmagauravam' (कर्मगौरवम्), श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय एवं तृतीय अध्यायों से संगृहीत है, जिसमें श्रीकृष्ण ने विषादग्रस्त अर्जुन को निःसंगभाव से नियत कर्म करने का उपदेश दिया है।

  • निष्काम कर्मयोगपाठ का केन्द्रीय संदेश है — निःसंगभाव से नियत कर्म करते रहना और फल में आसक्ति न रखना। कर्म में ही अधिकार है, फल में नहीं; कर्मों में कुशलता को ही 'योग' कहा गया है।
  • अकर्म पर कर्म की श्रेष्ठताकोई भी क्षणभर बिना कर्म किए नहीं रह सकता, इसलिए अकर्म से कर्म श्रेष्ठ है। जनकादि राजाओं ने कर्म से ही सिद्धि पाई — यह दृष्टान्त कर्तव्यपालन को जीवन का आधार सिद्ध करता है।
  • समत्व और लोककल्याणसुख-दुख, हानि-लाभ के द्वन्द्व से परे, ईर्ष्या-रहित रहकर लोककल्याण के लिए कर्म करना ही आदर्श है। श्रेष्ठ पुरुष का आचरण लोक के लिए प्रमाण बनता है, जिसका अन्य लोग अनुसरण करते हैं।
Essentials

Key points & formulas

  1. 01स्रोत: यह पाठ श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय एवं तृतीय अध्यायों से संगृहीत है; श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्मपर्व में विद्यमान है और इसमें सात सौ श्लोक एवं अठारह अध्याय हैं।
  2. 02केंद्रीय भाव: निःसंगभाव से नियत कर्म करते रहो, फल में कभी आसक्ति न रखो; कर्मों में कुशलता को ही योग कहा गया है।
  3. 03मुख्य पात्र: श्रीकृष्ण (उपदेशक) और विषादग्रस्त अर्जुन (शिष्य); जनकादि राजा उदाहरण के रूप में उद्धृत हैं जिन्होंने कर्म से ही संसिद्धि प्राप्त की।
  4. 04प्रमुख श्लोक: 'नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः' — भावार्थ: नियत कर्म करते रहो, कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है।
  5. 05प्रमुख श्लोक: 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सघ्गोऽस्त्वकर्मणि॥' — भावार्थ: कर्म में ही तुम्हारा अधिकार है, फल में कभी नहीं; कर्मफल की कामना मत करो और अकर्म में आसक्ति भी मत रखो।
  6. 06कठिन शब्दार्थ: 'यदृच्छालाभः' — जो कुछ भी मिल जाए (संयोगवश प्राप्ति); 'द्वन्द्वातीतः' — सुख-दुख, हानि-लाभ से परे; 'विमत्सरः' — ईर्ष्या से मुक्त।
  7. 07श्रेष्ठ पुरुष का आचरण लोक के लिए प्रमाण बनता है — 'यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥' — अन्य लोग उसी का अनुसरण करते हैं।
Questions

Frequently asked questions

01

कर्मगौरवम् पाठ किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह पाठ श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय एवं तृतीय अध्यायों से संगृहीत है। श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्मपर्व में विद्यमान है।

02

Karmagauravam path ka mool sandesh kya hai?

इस पाठ का मूल संदेश है कि सभी को निःसंगभाव से सदा सर्वहित के कार्यों में संलग्न रहना चाहिए। फल की आसक्ति त्यागकर, नियत कर्म करते रहना ही श्रेष्ठ मार्ग है।

03

कर्मगौरवम् में योग की परिभाषा क्या है?

पाठ में कर्मों में कुशलता को ही योग बताया गया है — 'योगः कर्मसु कौशलम्।'

04

अर्जुन को किसने और क्यों उपदेश दिया?

श्रीकृष्ण ने विषादग्रस्त अर्जुन को कर्त्तव्य का उपदेश देकर धर्मरक्षार्थ युद्ध के लिए प्रेरित किया।

05

जनकादि राजाओं ने सिद्धि कैसे प्राप्त की?

पाठ के अनुसार जनकादि राजाओं ने कर्म से ही संसिद्धि प्राप्त की — 'कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।'

06

'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' का अर्थ क्या है?

कर्म में ही तुम्हारा अधिकार है, फल में कभी नहीं। कर्मफल का हेतु मत बनो और अकर्म में भी आसक्ति मत रखो।

07

Karmagauravam mein asakt hokar karm karne ka kya phal bataya gaya hai?

पाठ के अनुसार 'असक्तो ह्याचरन् कर्म परमाप्नोति पूरुषः' — अनासक्त होकर कर्म करने वाला परम को प्राप्त होता है।

08

लोकसंग्रह का क्या अर्थ है और यह पाठ में कैसे आया है?

लोकसंग्रह का अर्थ है लोककल्याण, सबका भला। पाठ में कहा गया है कि विद्वान को लोकसंग्रह की इच्छा से, अनासक्त होकर वैसे ही कर्म करना चाहिए जैसे अज्ञानी आसक्तिपूर्वक करते हैं।

09

द्वन्द्वातीत और विमत्सर का क्या अर्थ है?

'द्वन्द्वातीतः' का अर्थ है सुख-दुख, हानि-लाभ से परे रहने वाला; 'विमत्सरः' का अर्थ है ईर्ष्या से मुक्त। ऐसा व्यक्ति कर्म करके भी बंधता नहीं।

10

श्रेष्ठ पुरुष का आचरण लोक पर क्या प्रभाव डालता है?

पाठ के अनुसार श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य लोग उसी का अनुसरण करते हैं — 'यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥'

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क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?

हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।

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