Summary
Chapter 1 of the Class 12 Hindi NCERT textbook (Antral), 'Surdas Ki Jhopri' (सूरदास की झोंपड़ी), यह पाठ प्रेमचंद के उपन्यास 'रंगभूमि' का एक अंश है, जिसमें दृष्टिहीन पात्र सूरदास की अदम्य जिजीविषा और विपत्ति में पुनर्निर्माण की भावना को चित्रित किया गया है।
- प्रतिशोध नहीं, पुनर्निर्माण का संकल्प — भैरों द्वारा झोंपड़ी जलाए जाने और जीवन भर की कमाई लुट जाने के बाद भी सूरदास किसी से बदला नहीं चाहता। मिठुआ की बात सुनकर वह फिर से बनाने का दृढ़ संकल्प लेता है — यही पाठ का केंद्रीय जीवन-दर्शन है।
- अपराजेय जिजीविषा — दृष्टिहीन होकर भी सूरदास टूटता नहीं। 'तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे' जैसे उत्तर उसके अदम्य आत्मबल और विपत्ति में भी न हारने वाले स्वभाव को उभारते हैं, जो पाठ का प्रेरक भाव है।
- पात्रों के माध्यम से मानव-प्रवृत्तियाँ — भैरों की ईर्ष्या-प्रतिशोध, जगधर की डाह, सुभागी का न्याय-प्रण और मिठुआ की मासूम चेतना — प्रेमचंद इन पात्रों से समाज की भिन्न प्रवृत्तियों और उनके टकराव को जीवंत करते हैं।
- मार्मिक बिंब-योजना — 'मानो किसी मित्र की चिताग्नि है' और 'फूस की राख नहीं, अभिलाषाओं की राख' जैसे बिंब आग की घटना को भावनात्मक गहराई देते हैं और सूरदास की भीतरी पीड़ा को दृश्यमान बनाते हैं।
Key points & formulas
- 01लेखक परिचय: इस पाठ के रचयिता प्रेमचंद हैं और यह उनके उपन्यास 'रंगभूमि' का अंश है।
- 02विधा: गद्य (उपन्यास-अंश) — कहानी-शैली में लिखा गया।
- 03केंद्रीय भाव: विपत्ति में प्रतिशोध नहीं, पुनर्निर्माण की अदम्य इच्छाशक्ति — सूरदास झोंपड़ी जलने के बावजूद किसी से प्रतिशोध नहीं चाहता, बल्कि पुनः बनाने का संकल्प लेता है।
- 04मुख्य पात्र व घटनाएँ: सूरदास (दृष्टिहीन नायक), भैरों (झोंपड़ी में आग लगाने वाला, रुपये चुराने वाला), जगधर (ईर्ष्यालु पड़ोसी), सुभागी (भैरों की पत्नी जो सूरदास के रुपये वापस दिलाने का प्रण लेती है), मिठुआ (बालक जिसके शब्दों से सूरदास को नई ऊर्जा मिलती है)।
- 05पाठ में आग की वर्णनात्मक छवियाँ हैं — जैसे 'मानो किसी मित्र की चिताग्नि है' — जो दृश्य को जीवंत बनाती हैं और घटना की गंभीरता व्यक्त करती हैं।
- 06कठिन शब्दार्थ (पाठ से): तस्कीन — तसल्ली, दिलासा; भूबल — ऊपर राख नीचे आग; हसद — ईर्ष्या, डाह।
- 07महत्त्वपूर्ण उद्धरण: 'यह फूस की राख न थी, उसकी अभिलाषाओं की राख थी' — सूरदास की भावनात्मक पीड़ा का सटीक वर्णन।
- 08पाठ का समापन: मिठुआ के प्रश्न 'और जो कोई सौ लाख बार लगा दे?' पर सूरदास का उत्तर — 'तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे' — उसके अपराजेय स्वभाव का प्रतीक है।
Frequently asked questions
01सूरदास की झोंपड़ी पाठ के लेखक कौन हैं? / Surdas Ki Jhopri ke lekhak kaun hain?
इस पाठ के लेखक प्रेमचंद हैं।
02यह पाठ किस उपन्यास से लिया गया है?
यह पाठ प्रेमचंद के उपन्यास 'रंगभूमि' का अंश है।
03सूरदास कौन है?
सूरदास एक दृष्टिहीन (अंधा) व्यक्ति है जो अपनी कठिन परिस्थितियों में भी प्रतिशोध के बजाय पुनर्निर्माण में विश्वास रखता है।
04सूरदास की झोंपड़ी में आग किसने और क्यों लगाई?
भैरों ने आग लगाई। उसने सूरदास को रुलाने और तड़पाने की गाँठ बाँध रखी थी क्योंकि सुभागी के झोंपड़ी में छिपने की घटना से मुहल्ले में उसकी बदनामी हुई थी।
05सूरदास के रुपयों का क्या हुआ?
भैरों ने झोंपड़ी में आग लगाने से पहले धरन की आड़ में रखी पोटली चुरा ली, जिसमें पाँच सौ से अधिक रुपये थे।
06'यह फूस की राख न थी, उसकी अभिलाषाओं की राख थी' — इस पंक्ति का क्या तात्पर्य है?
सूरदास को झोंपड़ी या बर्तन जलने का दुःख नहीं था, बल्कि उस पोटली के खो जाने का था जो उसकी उम्र भर की कमाई थी और जिस पर उसके पितृदान, मिठुआ की सगाई, कुआँ बनवाने जैसी सारी आशाएँ टिकी थीं।
07मिठुआ कौन है और पाठ में उसकी क्या भूमिका है?
मिठुआ एक बालक है। जब वह रोता हुआ आ रहा था और घीसू उसे 'खेल में रोते हो!' कहकर चिढ़ा रहा था, तभी यह बात सूरदास ने सुनी और उसे नैराश्य से बाहर निकलने की प्रेरणा मिली।
08'तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे' — यह किसने और किस संदर्भ में कहा?
सूरदास ने यह मिठुआ के प्रश्न 'और जो कोई सौ लाख बार लगा दे?' के उत्तर में दृढ़ता से कहा।
09सुभागी ने क्या प्रण लिया?
सुभागी ने कहा — 'मेरे ही कारण इस पर यह बिपत पड़ी है। मैंने ही उजाड़ा है, मैं ही बसाऊँगी। जब तक इसके रुपये न दिला दूँगी, मुझे चैन न आएगी।'
10जगधर के मन में किस प्रकार का भाव था?
जगधर के मन में ईर्ष्या (हसद) थी। पाठ में लिखा है — 'छाती पर साँप लोट रहा था' — क्योंकि भैरों के हाथ इतने रुपये लग गए थे।
11Surdas Ki Jhopri ka kendriya sandesh kya hai?
इस पाठ का केंद्रीय संदेश है कि विपत्ति में प्रतिशोध नहीं, पुनर्निर्माण ही सच्चे साहस की पहचान है — जैसा सूरदास का अपराजेय स्वभाव दर्शाता है।
12भैरों और जगधर के चरित्रों में क्या समानता है?
दोनों सूरदास से ईर्ष्या करते हैं। भैरों ने झोंपड़ी जलाई और रुपये चुराए; जगधर ने भैरों को उकसाने में प्रमुख भूमिका निभाई और रुपये मिलने पर उसके मन में भी ईर्ष्या जागी।
13पाठ में 'तस्कीन' शब्द का क्या अर्थ है?
पाठ के शब्दार्थ-खंड के अनुसार तस्कीन का अर्थ है — तसल्ली, दिलासा।
14क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?
हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।
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