Summary
Chapter 8 of the Class 10 Sanskrit NCERT textbook (Abhyaswaan Bhav), 'Pratyayah' (प्रत्ययाः), संस्कृत व्याकरण के प्रत्ययों पर केंद्रित पाठ है — शब्द या धातु के अंत में जुड़ने वाले शब्दांश जो अर्थ बदलते हैं; इसमें कृदन्त, तद्धित तथा स्त्री-प्रत्ययों का सोदाहरण अभ्यास दिया गया है।
- प्रत्यय की परिभाषा एवं भेद — स्रोतानुसार 'शब्दस्य धातो: वा अन्ते ये शब्दांशा: प्रयुज्यन्ते ते प्रत्यया: भवन्ति' — प्रत्यय अर्थ बदलने वाले शब्दांश हैं। ये तीन प्रकार के होते हैं — कृदन्त, तद्धित और स्त्री-प्रत्यय।
- कृदन्त प्रत्यय — शतृ परस्मैपदी धातु से विशेषण बनाता है (पठ्+शतृ = पठत्) और शानच् आत्मनेपदी धातु से (वृध्+शानच् = वर्धमान:)। तव्यत् विधिलिङ् अर्थ में (पठितव्य:) तथा अनीयर् योग्यार्थ में (पठनीय) आता है, जहाँ कर्ता तृतीया और कर्म प्रथमा में होता है।
- तद्धित एवं स्त्री-प्रत्यय — त्व/तल् भाववाचक संज्ञा बनाते हैं — त्व से नपुंसकलिंग (विद्वत्त्वम्) और तल् से स्त्रीलिंग (जडता); ठक् 'इक' रूप में विशेषण बनाता है (धर्म+ठक् = धार्मिक)। अंत में टाप् एवं ङीप् से पुल्लिंग-से-स्त्रीलिंग निर्माण का अभ्यास है।
- पाठ में उद्धृत श्लोक — त्व-प्रत्यय प्रसंग में उद्धृत — 'विद्वत्त्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन। स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।।' भावार्थ यह कि राजा केवल अपने देश में सम्मानित होता है, किंतु विद्वान् सर्वत्र सम्मानित होता है।
Key points & formulas
- 01पाठ का स्रोत एवं विधा: NCERT कक्षा 10 संस्कृत अभ्यासवान् भव (व्याकरण-अभ्यास पुस्तिका); यह पाठ सोदाहरण व्याकरण विश्लेषण है — कोई कथा या कवि नहीं।
- 02केंद्रीय परिभाषा (स्रोत से): 'शब्दस्य धातो: वा अन्ते ये शब्दांशा: प्रयुज्यन्ते ते प्रत्यया: भवन्ति' — प्रत्यय शब्द या धातु के अंत में जुड़ने वाले शब्दांश हैं जो अर्थ बदलते हैं।
- 03शतृ-प्रत्यय परस्मैपदी धातुओं के साथ विशेषण बनाता है (पठ्+शतृ = पठत्); शानच् आत्मनेपदी धातुओं के साथ (वृध्+शानच् = वर्धमान:); दोनों तीनों लिंगों में बनते हैं।
- 04तव्यत्-प्रत्यय विधिलिङ् (चाहिए) के अर्थ में कर्मवाच्य में आता है (पठ्+तव्यत् = पठितव्य:); अनीयर्-प्रत्यय योग्यार्थ में (पठ्+अनीयर् = पठनीय); दोनों में कर्ता तृतीया और कर्म प्रथमा में होता है।
- 05अनीयर् खंड में स्रोत में बार-बार आने वाली पंक्ति: 'लोकहितं मम करणीयम्' — जन-कल्याण ही मेरा कर्तव्य है, यह भाव इस काव्यांश का मूल है।
- 06स्रोत में त्व-प्रत्यय प्रसंग में उद्धृत श्लोक: 'विद्वत्त्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन। स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।।' — भावार्थ: राजा केवल अपने देश में सम्मानित होता है, किंतु विद्वान् सर्वत्र सम्मानित होता है।
- 07त्व/तल् प्रत्यय भाववाचक संज्ञा बनाते हैं — 'त्व' से नपुंसकलिंग (विद्वत्त्वम्, नृपत्वम्), 'तल्' से स्त्रीलिंग (जडता, दीर्घता); ठक् प्रत्यय 'इक' रूप में परिवर्तित होकर विशेषण बनाता है (धर्म+ठक् = धार्मिक)।
- 08कठिन शब्दार्थ (स्रोत से): (1) कृदन्त — क्रिया/धातु से बने प्रत्यय; (2) तद्धित — शब्दों से बने प्रत्यय; (3) कर्मवाच्य — वह वाक्य-संरचना जिसमें कर्म प्रथमा और कर्ता तृतीया विभक्ति में हो; (4) अव्यय — वे पद जो क्त्वा-तुमुन्-प्रत्यययुक्त होते हैं।
Frequently asked questions
01प्रत्यया: पाठ में कितने प्रकार के प्रत्यय बताए गए हैं?
स्रोत के अनुसार प्रत्यय तीन प्रकार के होते हैं — कृदन्त (क्रियाओं के साथ प्रयुक्त), तद्धित (शब्दों के साथ प्रयुक्त) और स्त्री-प्रत्यय (पुल्लिंग को स्त्रीलिंग में बदलने के लिए)।
02शतृ और शानच् प्रत्यय में क्या अंतर है?
स्रोत के अनुसार शतृ-प्रत्यय परस्मैपदी धातुओं के साथ प्रयुक्त होता है (जैसे पठ्+शतृ = पठत्) और शानच् आत्मनेपदी धातुओं के साथ (जैसे सेव्+शानच् = सेवमान:)। दोनों विशेषण बनाते हैं।
03तव्यत् प्रत्यय का प्रयोग किस अर्थ में होता है?
स्रोत के अनुसार तव्यत्-प्रत्यय का प्रयोग विधिलिङ् के अर्थ में होता है — अर्थात् 'चाहिए' के भाव में। यह कर्मवाच्य में प्रयुक्त होता है; कर्ता तृतीया विभक्ति में और कर्म प्रथमा विभक्ति में आता है।
04Pratyayah chapter mein kaunsa shlok diya gaya hai?
स्रोत में त्व-प्रत्यय प्रसंग में यह श्लोक उद्धृत है: 'विद्वत्त्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन। स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।।' अर्थात् विद्वत्ता और राजत्व कभी समान नहीं — राजा केवल अपने देश में, जबकि विद्वान् सर्वत्र सम्मानित होता है।
05मतुप् और वतुप् प्रत्यय में क्या भेद है?
स्रोत के अनुसार अकारान्त शब्दों के साथ वतुप् प्रत्यय लगता है (धन+वतुप् = धनवान्) और अ-भिन्नस्वरान्त शब्दों के साथ मतुप् (बुद्धि+मतुप् = बुद्धिमान्)। दोनों 'युक्त/संपन्न' अर्थ में आते हैं।
06अनीयर् प्रत्यय किस अर्थ में प्रयुक्त होता है?
स्रोत के अनुसार अनीयर्-प्रत्यय योग्यार्थ में प्रयुक्त होता है — 'करने योग्य' के भाव में। जैसे पठ्+अनीयर् = पठनीय (पढ़ने योग्य)। यह भी कर्मवाच्य में ही आता है।
07त्व और तल् प्रत्ययों में क्या अंतर है?
स्रोत के अनुसार दोनों भाववाचक प्रत्यय हैं, किंतु लिंग में अंतर है: 'त्व' से शब्द नपुंसकलिंग बनता है (विद्वत्त्वम्, नृपत्वम्) और 'तल्' से स्त्रीलिंग बनता है (जडता, दीर्घता)।
08ठक् pratyay ka roop kaise banta hai?
स्रोत के अनुसार ठक् प्रत्यय 'इक' रूप में परिवर्तित होता है और आदिस्वर में वृद्धि होती है। जैसे धर्म+ठक् = धार्मिक, नगर+ठक् = नागरिक। यह विशेषण के रूप में तीनों लिंगों में प्रयुक्त होता है।
09स्त्री-प्रत्ययों में टाप् और ङीप् का प्रयोग कहाँ होता है?
स्रोत के अनुसार टाप् प्रत्यय (आ) अकारान्त पुल्लिंग शब्दों से स्त्रीलिंग बनाता है (बालक+टाप् = बालिका) और ङीप् प्रत्यय (ई) हलन्त व अन्य शब्दों से स्त्रीलिंग बनाता है (गोप+ङीप् = गोपी, नद+ङीप् = नदी)।
10इन् (णिनि) प्रत्यय का प्रयोग किसके साथ होता है?
स्रोत के अनुसार अकारान्त शब्दों के साथ 'युक्त' अर्थ में णिनि (इन्) प्रत्यय लगता है; जैसे गुण+इन् = गुणिन् (गुणों से युक्त), दण्ड+इन् = दण्डिन्, बल+इन् = बलिन्।
11NCERT Class 10 Sanskrit Abhyaswaan Bhav mein pratyay kitne hain?
स्रोत में इस अध्याय में मुख्यतः सात प्रत्यय-प्रकार पढ़ाए गए हैं — शतृ, शानच्, तव्यत्, अनीयर्, मतुप्/वतुप् व इन्, त्व/तल्, ठक् और स्त्री-प्रत्यय (टाप्, ङीप्)।
12क्त्वा और तुमुन् प्रत्यय युक्त पद किस श्रेणी में आते हैं?
स्रोत में ध्यातव्य तथ्य के रूप में बताया गया है: 'क्त्वा-तुमुन्-प्रत्यययुक्तानि पदानि अव्ययानि भवन्ति' — अर्थात् ये पद अव्यय होते हैं।
13क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?
हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप। CBSEPrepMaster पर NCERT Class 10 Sanskrit Abhyaswaan Bhav के प्रत्यया: अध्याय का PDF बिना किसी पंजीकरण के देखा और डाउनलोड किया जा सकता है।
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